
एआईएन/आकांक्षा मन्ना
नई दिल्ली — 14वें ग्लोबल फेस्टिवल ऑफ जर्नलिज्म मारवाह स्टूडियो नोएडा में 12 फरवरी 2026 को इंटरनेशनल चैंबर ऑफ मीडिया एंड एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री और आरजेएस पीबीएस -आरजेएस पाॅजिटिव मीडिया के संयुक्त तत्वावधान में मीडिया लिटरेसी सेमिनार, अवार्ड फंक्शन और पाॅजिटिव मीडिया बुक “ग्रन्थ 06 का लोकार्पण हुआ। श्रृंखलाबद्ध अमृत काल का सकारात्मक भारत -उदय के 521वें इस कार्यक्रम के संयोजक उदय कुमार मन्ना ने कहा कि अनुभवी पत्रकारों, शिक्षाविदों और सरकारी अधिकारियों ने ‘इन्फोडेमिक’ (सूचना महामारी) के खतरनाक प्रभावों पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि सकारात्मक पत्रकारिता के संकल्प क्रांति वर्ष 2026 में टीफा26( टीम इंडेपेंडेंस डे फंक्शन अगस्त 2026 ) के साथ-साथ कार्यक्रमों के अतिथि भी सकारात्मक संसार के कारवां में शामिल होते जा रहे हैं।
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आरजेएस पीबीएस -आरजेएस पाॅजिटिव मीडिया के राष्ट्रीय ऑब्जर्वर दीप माथुर ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि आरजेएस प्रिंट और डिजिटल माध्यम में अपने सभी कार्यक्रमों और प्रयासों का दस्तावेजीकरण कर रहा है।
इस ग्यारह साल पुराने सकारात्मक आंदोलन के एक ऐतिहासिक पड़ाव के रूप में, एएएफटी यूनिवर्सिटी के चांसलर और इंटरनेशनल चैंबर ऑफ मीडिया एंड एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री के अध्यक्ष और ग्लोबल फेस्टिवल ऑफ जर्नलिज्म के अध्यक्ष. डा.संदीप मारवाह को औपचारिक रूप से आरजेएस पॉजिटिव मीडिया भारत -उदय ग्लोबल मूवमेंट का पहला संरक्षक नियुक्त किया गया। आरजेएस पीबीएस के वैश्विक परिवार की इस पहल को डा. मारवाह ने सहर्ष स्वीकार किया और पाॅजिटिव मीडिया को जन-जन तक पहुंचाने में सहयोग की जिम्मेदारी ली ।

इंडिया हैबिटेट सेंटर के निदेशक प्रो (डा.)के जी सुरेश की अध्यक्षता में मीडिया लिटरेसी सेमिनार काफी सफल रहा। आईआईएमसी के न्यूज मीडिया की विभागाध्यक्ष और कोर्स डायरेक्टर डा.अनुभूति यादव ,निस्कोर्ट मीडिया काॅलेज की प्रिंसिपल डा.रितु दुबे,प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष गौतम लाहिड़ी, वर्किंग जर्नलिस्ट्स ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय उपाध्याय ने मीडिया लिटरेसी को आज के समय की बेहद आवश्यकता बताया और राष्ट्रीय मीडिया साक्षरता मिशन के लिए सहयोग देने का संकल्प लिया।
मुख्य अतिथि वर्ल्ड मीडिया गुरु डा.संदीप मारवाह ने पत्रकारिता उद्योग में आर्थिक बदलावों का एक विश्लेषणात्मक विवरण देते हुए कहा कि जब कोई मीडिया आउटलेट अपना वस्तुनिष्ठ संतुलन खो देता है या रचनात्मक समाधान पेश किए बिना केवल आलोचनात्मक बन जाता है, तो उसका बाजार मूल्य और दर्शकों का भरोसा गिरना तय है। उन्होंने एक समय के प्रभावशाली समाचार आउटलेट्स के स्वामित्व में आए बदलाव और उनके वित्तीय संघर्षों को इस बात के प्रमाण के रूप में पेश किया कि जनता अब नैरेटिव-संचालित पत्रकारिता से दूर होकर तथ्य-आधारित सकारात्मकता की ओर बढ़ रही है। उन्होंने जोर देकर कहा कि आरजेएस का सकारात्मक आंदोलन कड़वे सच से बचने के बारे में नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करने के बारे में है कि आलोचना रचनात्मक हो और राष्ट्र-निर्माण के व्यापक उद्देश्य की पूर्ति करे।
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एमसीयू, भोपाल के पूर्व कुलपति और आईआईएमसी के पूर्व महानिदेशक तथा इंडिया हैबिटेट सेंटर के निदेशक प्रो. के. जी. सुरेश ने वर्तमान सूचना वातावरण के बारे में कड़ी चेतावनी दी। उन्होंने ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ के उदय को आधुनिक भारत में वैचारिक विकृति का प्राथमिक स्रोत बताया। प्रो. सुरेश ने तर्क दिया कि असत्यापित क्लिप और भ्रामक आख्यानों के माध्यम से सामाजिक ताने-बाने को व्यवस्थित रूप से तोड़ा जा रहा है, जिसका उद्देश्य सांप्रदायिक और जाति-आधारित घर्षण पैदा करना है।उन्होंने सवाल उठाया कि यदि शिक्षित वर्ग भी इतने उन्नत डीपफेक से गुमराह हो सकता है, तो औसत नागरिक के पास राष्ट्रीय मीडिया साक्षरता नीति के बिना क्या विकल्प बचता है। धन्यवाद ज्ञापन करते हुए योगी कवि आचार्य प्रेम भाटिया ने कहा कि फैक्ट आधारित पत्रकारिता से सत्य उजागर होता है – “जो सही को मान लेता है गलत, वो ग़लत को मान लेता है सही” । इन बातों के वट्सप यूनिवर्सिटी से हमें बचना जरूरी है। सत्यमेव जयते तो होना ही है और मीडिया भरोसेमंद बनता है जैसे “बात करने का मजा आता है तब,दिल से निकली बात पहुंचे दिल तलक “।

आरजेएस पीबीएस -आरजेएस पाॅजिटिव मीडिया के संस्थापक व राष्ट्रीय संयोजक उदय कुमार मन्ना के नेतृत्व में आयोजित इस मंच ने पारंपरिक पत्रकारिता और आधुनिक डिजिटल परिदृश्य के बीच की खाई को पाटने का काम किया। शिखर सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य ‘मीडिया शिक्षा’, जो व्यावसायिक आजीविका पर केंद्रित है, से ‘मीडिया साक्षरता’ की ओर मोड़ना था, जिसे अब लोकतांत्रिक स्थिरता के लिए एक अनिवार्य कौशल माना जा रहा है। कार्यक्रम में इस बात पर जोर दिया गया कि जैसे-जैसे भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति बनने की ओर अग्रसर है, उसके सूचना तंत्र की सत्यनिष्ठा उतनी ही आवश्यक है जितनी कि उसकी वित्तीय संरचना।इस अवसर पर टीफा26 को सम्मानित किया गया और पूर्व में इंडिया हैबिटेट सेंटर में हुए प्रथम मीडिया लिटरेसी वर्कशॉप का उन्हें सहभागिता प्रमाण पत्र भी प्रदान किया गया।

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सामाजिक संकट और व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी की चुनौती
प्रो. सुरेश ने स्पष्ट रूप से कहा कि संदर्भ के बिना दी गई जानकारी एक झूठ के समान है। उन्होंने गलत सूचनाओं के हथियार के रूप में उपयोग किए जाने का एक विस्तृत विवरण दिया। उन्होंने बैंक कर्मचारी से जुड़ी एक हालिया वायरल घटना का हवाला दिया, जहां चयनात्मक संपादन के माध्यम से एक सामान्य ग्राहक विवाद को लक्षित जाति-आधारित हमले के रूप में प्रस्तुत किया गया था। जब तक पूरा संदर्भ सामने आया कि विवाद का कोई सांप्रदायिक या जातिगत आधार नहीं था, तब तक सामाजिक सद्भाव को नुकसान पहुँच चुका था। उन्होंने जोर देकर कहा कि डिजिटल युग ने उन संस्थाओं को हटा दिया है जो पहले तथ्यों की सटीकता सुनिश्चित करती थीं, जिससे जनता भावनात्मक हेरफेर के प्रति संवेदनशील हो गई है।

मंच ने आधुनिक धोखे की तकनीकी परिष्कार पर भी चर्चा की। प्रो. सुरेश ने बताया कि कैसे हाई-एंड एनीमेशन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का उपयोग अब समाज के सबसे शिक्षित वर्गों को भी धोखा देने के लिए किया जा रहा है। उन्होंने एक वायरल वीडियो का संदर्भ दिया, जिसमें कथित तौर पर मध्य भारत में एक बाघ को वन रक्षक पर हमला करते दिखाया गया था। इसे पूरी तरह से डिजिटल निर्माण के रूप में पहचाने जाने से पहले कई उच्च-प्रोफ़ाइल व्यक्तियों और सरकारी अधिकारियों द्वारा साझा किया गया था।
मीडिया अखंडता का आर्थिक प्रभाव

डॉ. संदीप मारवाह ने अंतरराष्ट्रीय पत्रकारिता दिवस 12 फरवरी के अवसर पर बोलते हुए मीडिया उद्योग के आर्थिक अस्तित्व को पत्रकारिता के तीन स्तंभों—सूचना देना, शिक्षित करना और मनोरंजन करना—के पालन से जोड़ा। उन्होंने तर्क दिया कि प्रमुख मीडिया घरानों की वित्तीय स्थिरता सीधे उनकी सार्वजनिक विश्वसनीयता से जुड़ी होती है।

उदय कुमार मन्ना ने आरजेएस पॉजिटिव ब्रॉडकास्टिंग हाउस के आर्थिक दर्शन का और विस्तार किया। उन्होंने खुलासा किया कि यह संगठन पारंपरिक दान के बजाय ‘सहयोगात्मक निवेश’ के मॉडल पर काम करता है। इस मॉडल ने आरजेएस को पाॅजिटिव मीडिया बुक ग्रंथ’ के नाम से छः बड़े संस्करण प्रकाशित किए हैं , जो सकारात्मक भारतीय आख्यानों के स्थायी ऐतिहासिक रिकॉर्ड के रूप में कार्य करते हैं। ये पुस्तकें पुस्तकालयों और संस्थानों को वितरित की जाती हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि आज किया जा रहा कार्य 2047 की पीढ़ियों के लिए संरक्षित रहे।

खोजी संवाद: प्रश्न और उत्तर
मंच पर विशेषज्ञों के पैनल और दर्शकों के बीच एक गहन संवाद हुआ, जिसमें मीडिया साक्षरता के व्यावहारिक अनुप्रयोग पर ध्यान केंद्रित किया गया।
प्रश्न: सूचनाओं की इस भारी बाढ़ के बीच एक आम नागरिक सही और मनगढ़ंत खबर के बीच अंतर कैसे कर सकता है?
प्रो. के. जी. सुरेश: इसका समाधान सूचना की खपत के प्रति एक श्रेणीबद्ध दृष्टिकोण में निहित है। सबसे पहले हमें स्रोत और संदर्भ की तलाश करनी चाहिए। कोई भी जानकारी जो तत्काल और हिंसक भावनात्मक प्रतिक्रिया पैदा करती है, उसे संदेह के साथ देखा जाना चाहिए। मैं नागरिकों को पीआईबी फैक्ट चेक जैसे सरकारी प्रमाणित हैंडल का उपयोग करने की सलाह देता हूँ। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि हम एक राष्ट्रीय मीडिया साक्षरता नीति की वकालत कर रहे हैं जहां इन सत्यापन तकनीकों को कम उम्र से ही स्कूलों में सिखाया जाना चाहिए। मीडिया साक्षरता अब एक विकल्प नहीं बल्कि एक नागरिक कर्तव्य है।

प्रश्न: क्या एआई मानवीय सोच की तुलना में बहुत तेजी से विकसित हो रहा है, और क्या इसका मतलब सत्य का अंत है?
गौतम लाहिड़ी और संजय उपाध्याय ने आज की पत्रकारिता पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि हालांकि एआई जैसी तकनीक मानवीय अनुकूलन की तुलना में पांच गुना तेजी से विकसित हो रही है, लेकिन इसमें ‘धर्म’ या नैतिक मानवीय दिशा की कमी है। तकनीक ज्ञान तो प्रदान करती है, लेकिन यह अक्सर मानवीय चक्र में एक खालीपन छोड़ देती है। एकमात्र बचाव नैतिक एकीकरण है। हमें अगली पीढ़ी को मानवीय सोच को एक फिल्टर के रूप में उपयोग करने के लिए प्रशिक्षित करना चाहिए। सकारात्मकता केवल एक भावना नहीं है, बल्कि झूठ के स्वचालित प्रसार के खिलाफ एक सुरक्षा तंत्र है।

प्रश्न: क्या इस बात का खतरा है कि सकारात्मक मीडिया को केवल सरकारी प्रचार के रूप में देखा जाएगा?
प्रो. के. जी. सुरेश: यह एक महत्वपूर्ण अंतर है। सकारात्मक मीडिया का मतलब आलोचना का अभाव नहीं है। यदि मीडिया आलोचनात्मक नहीं है, तो उसकी लोकतांत्रिक भूमिका समाप्त हो जाती है। जिस सकारात्मकता की हम बात कर रहे हैं वह ‘इरादे’ को संदर्भित करती है। हमारा इरादा राष्ट्र निर्माण का होना चाहिए, न कि सनसनी फैलाने या राजनीतिक लाभ के लिए संस्थानों को नीचा दिखाना। रचनात्मक आलोचना वह दृष्टिकोण प्रदान करती है जो समाधान की ओर ले जाती है।

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