
एआईएन द्वारा प्रस्तूत
लेखकगण :-
सैयद मुहम्मद शाहिद इकबाल ,
भदौनी शरीफ नवादा .
डॉ संजीव कुमार ,
सहायक प्रोफेसर,अर्थशास्त्र
नवादा विधि महाविद्यालय नवादा
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“दवाएँ जहाँ जीवन देने के लिए बनाई जाती हैं, वहाँ व्यवस्था के खोखलेपन ने उन्हें मौत का सौदा बना दिया है।”
स्वास्थ्य सेवा में भ्रष्टाचार भारत में सबसे गंभीर समस्याओं में से एक है। हाल में मध्य प्रदेश और राजस्थान में कफ सिरप पीने से बच्चों की मौतों ने एक बार फिर दवा नियमन और स्वास्थ्य व्यवस्था की जड़ों तक फैली गंभीर खामियों को उजागर किया है। यह घटना कोई अकेली दुर्घटना नहीं, बल्कि एक व्यवस्थागत विफलता का दर्दनाक प्रमाण है।
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त्रासदी के आँकड़े: क्या कहते हैं तथ्य? :-
ये मौतें किसी सामान्य चिकित्सीय जटिलता का परिणाम नहीं, बल्कि सीधे-सीधे दवाओं में जहरीली मिलावट के कारण हुई हैं। मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में केवल एक महीने के भीतर किडनी खराब होने से 11 बच्चों की मौत हो चुकी है। प्रभावित बच्चों के परिजनों का कहना है कि कोल्ड्रिफ नामक कफ सिरप पीने के बाद बच्चों की तबीयत तेजी से बिगड़ी।
तमिलनाडु ड्रग्स कंट्रोल विभाग की जाँच में इस सिरप के बैच एस आर-13 को ‘मिलावटी’ पाया गया, जिसमें 48.6 प्रतिशत डायथिलीन ग्लाइकॉल मिला हुआ था। डायथिलीन ग्लाइकॉल एक ज़हरीला औद्योगिक सॉल्वेंट है जो ब्रेक फ्लूड और फैब्रिक-डाई उत्पादन में इस्तेमाल होता है।
मौत के शिकार बच्चों में से एक, चार साल के उसैद की कहानी इस त्रासदी की पीड़ा को समझने के लिए पर्याप्त है। उसैद को 25 अगस्त को हल्की सर्दी, खाँसी और बुखार आया था, और महज 13 सितंबर को किडनी के खराब होने से उसकी मौत हो गई।
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विषैला तत्व: डायथिलीन ग्लाइकॉल क्या है और कैसे काम करता है? :-
डायथिलीन ग्लाइकॉल (DEG) एक विषैला औद्योगिक सॉल्वेंट है जिसका दवाओं में कोई स्थान नहीं होना चाहिए। यह तत्व मुख्य रूप से लिवर, दिमाग और गुर्दे की कोशिकाओं को गंभीर नुकसान पहुँचाता है।
सामान्य दवा निर्माण में ग्लिसरीन या प्रोपिलीन ग्लाइकोल जैसे सुरक्षित सहायक तत्वों का उपयोग किया जाता है, लेकिन लागत कम करने के लालच में कई कंपनियाँ इनकी जगह सस्ते DEG का प्रयोग करती हैं। DEG युक्त दवा के सेवन से हुई विषाक्तता के मामलों में मृत्यु दर 80 प्रतिशत तक पहुँच सकती है।
यह समस्या नई नहीं है। 2022 में अफ्रीकी देश गाम्बिया में भारतीय कंपनी द्वारा निर्मित दवाओं में DEG की मिलावट के कारण 70 से अधिक बच्चों की मौत हो चुकी है।
नियामक ढाँचा: कहाँ हो रही है चूक? :-
भारत में दवाओं की सुरक्षा और गुणवत्ता की निगरानी का दायित्व केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) पर है, जो स्वास्थ्य मंत्रालय के अधीन कार्य करता है। CDSCO का प्रमुख, ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (DCGI), नई दवाओं की स्वीकृति और नैदानिक परीक्षणों की अनुमति के लिए जिम्मेदार है।
इसके बावजूद, व्यवस्था में कई स्तरों पर गंभीर खामियाँ हैं:
· राज्य-केंद्र समन्वय की कमी: दवा नियमन का कार्य केंद्र और राज्य सरकारों के बीच बंटा हुआ है, जिससे जवाबदेही धुंधली हो जाती है।
· निरीक्षण और परीक्षण का अभाव: कई राज्यों में दवा निरीक्षकों की कमी है, और परीक्षण प्रयोगशालाओं की संख्या एवं क्षमता अपर्याप्त है।
· दंडात्मक कार्रवाई का अभाव: नियम तोड़ने वाली कंपनियों के विरुद्ध कठोर और त्वरित कार्रवाई नहीं होती।
भ्रष्टाचार का दुष्चक्र: स्वास्थ्य सेवा में व्याप्त समस्या :-
ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के एक सर्वे के अनुसार, भारत में स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र सबसे भ्रष्ट सेवा क्षेत्रों में से एक है। यह भ्रष्टाचार एक जटिल नेटवर्क के रूप में काम करता है:
स्वास्थ्य सेवा भ्रष्टाचार के प्रमुख रूप:
· दवा खरीद में गड़बड़ी: दवा खरीद प्रक्रिया में दलाली और कमीशनखोरी
· अनावश्यक उपचार: रोगियों की आवश्यकता से अधिक जाँच और उपचार करना
· दवा कंपनियों से कमीशन: विशिष्ट दवाओं को बेचने के लिए चिकित्सकों को प्रोत्साहन राशि
· नकली/मिलावटी दवाएँ: गुणवत्ता मानकों की अनदेखी कर सस्ती, असुरक्षित दवाएँ बेचना
आम जनता पर प्रभाव:
· वित्तीय बोझ: अनावश्यक उपचार और महँगी दवाओं से आम लोगों पर आर्थिक दबाव
· स्वास्थ्य जोखिम: नकली या मिलावटी दवाओं से गंभीर स्वास्थ्य समस्याएँ
· विश्वास का संकट: स्वास्थ्य व्यवस्था में आम लोगों का विश्वास कम होना
· सेवा की कमी: संसाधनों के दुरुपयोग से गरीबों को गुणवत्तापूर्ण सेवा से वंचित रहना
संभावित समाधान: कैसे सुधर सकती है व्यवस्था? :-
1. नियामक सुधार
· राष्ट्रीय दवा निगरानी प्रणाली: देशव्यापी डिजिटल प्लेटफॉर्म जो दवाओं के निर्माण से लेकर बिक्री तक हर चरण की निगरानी करे
· सख्त दंड प्रावधान: मिलावटी दवा बनाने वालों के विरुद्ध आजीवन कारावास और भारी जुर्माने का प्रावधान
· नियमित और अचानक निरीक्षण: दवा निर्माता इकाइयों का बिना सूचना के निरीक्षण
2. प्रौद्योगिकी का उपयोग
· क्यूआर कोड सिस्टम: हर दवा की पैकिंग पर अनूठा क्यूआर कोड जिससे उसकी प्रामाणिकता सत्यापित की जा सके
· डिजिटल ट्रैकिंग: दवाओं के परिवहन और भंडारण की वास्तविक समय में निगरानी
3. सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली को मजबूत करना
· आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं का विस्तार: प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PMJAY) जैसे कार्यक्रम भ्रष्टाचार को कम करने में सहायक हो सकते हैं
· सार्वजनिक अस्पतालों की गुणवत्ता में सुधार: गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएँ निजी क्षेत्र में भी प्रतिस्पर्धा बढ़ाकर भ्रष्टाचार को कम कर सकती हैं
4. जन जागरूकता और सशक्तिकरण
· दवा सुरक्षा शिक्षा: आम लोगों को दवाओं की प्रामाणिकता जाँचने के तरीके सिखाना
· शिकायत निवारण तंत्र: दवाओं की गुणवत्ता संबंधी शिकायतों के लिए सरल और प्रभावी तंत्र
· रोगी अधिकारों का प्रसार: स्वास्थ्य सेवा में रोगियों के अधिकारों और जिम्मेदारियों के बारे में जागरूकता फैलाना
स्वास्थ्य का अधिकार: संवैधानिक दृष्टि:-
सर्वोच्च न्यायालय ने कई मौकों पर स्वास्थ्य के अधिकार को अनुच्छेद 21 (जीवन के अधिकार) का अभिन्न अंग माना है। संविधान के राज्य के नीति निदेशक तत्व (अनुच्छेद 47) राज्य पर यह दायित्व डालते हैं कि वह अपने नागरिकों के जीवन स्तर और स्वास्थ्य में सुधार के लिए कदम उठाए।
राजस्थान सरकार ने हाल ही में स्वास्थ्य का अधिकार विधेयक पारित किया है जो राज्य के प्रत्येक निवासी को सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं पर मुफ्त सेवाओं का अधिकार देता है। ऐसे कदम स्वास्थ्य को मूलभूत अधिकार मानने की दिशा में महत्वपूर्ण हैं।
भारतीय दवा उद्योग: चुनौतियाँ और संभावनाएँ :-
भारत दुनिया का चौथा सबसे बड़ा दवा निर्माता देश है और दवा उद्योग राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हाल के वर्षों में भारत ने कोविड-19 टीकों के विकास और वितरण में अपनी क्षमता का परिचय दिया है। लेकिन इसी उद्योग की कुछ इकाइयों द्वारा मिलावटी दवाएँ बनाना पूरे देश की प्रतिष्ठा के लिए खतरा है।
दवा निर्यात में भारत की बड़ी भूमिका को देखते हुए गुणवत्ता मानकों का कड़ाई से पालन न केवल घरेलू स्वास्थ्य के लिए, बल्कि अंतरराष्ट्रीय विश्वसनीयता के लिए भी आवश्यक है।
निष्कर्ष: जवाबदेही और सामूहिक जिम्मेदारी:-
बच्चों की मौतों की ये घटनाएँ केवल दवा कंपनियों या नियामकों की विफलता नहीं, बल्कि पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था के नैतिक पतन का संकेत हैं। यह संकट तब तक हल नहीं होगा जब तक:
1. दवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए कड़े नियामक ढाँचे का निर्माण नहीं होता
2. नियमों के उल्लंघन पर त्वरित और कठोर कार्रवाई नहीं की जाती
3. स्वास्थ्य को मूलभूत अधिकार के रूप में मान्यता नहीं दी जाती
4. सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली को मजबूत करने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं आवंटित किए जाते
हर बच्चे की मौत हमारी सामूहिक विवेकहीनता का प्रमाण है। यह समय मात्र शोक मनाने का नहीं, बल्कि व्यवस्थागत सुधारों की माँग करने का है। स्वास्थ्य सेवा का भ्रष्टाचार मुक्त, पारदर्शी और जवाबदेह होना हर नागरिक का अधिकार है, और इस अधिकार की रक्षा के लिए सामूहिक प्रयास ही एकमात्र रास्ता है।
सवाल यह नहीं कि अगली बार कौन मरेगा, बल्कि यह है कि हम अगली मौत को रोकने के लिए आज क्या कर रहे हैं?

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