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जन हस्तक्षेप – फासीवादी मंसूबों के खिलाफ अभियान।

अमेरिका-इजरायल-ईरान युद्ध: घुटनों पर रेंग रही मोदी सरकार की विदेश नीति: जनहस्तक्षेप।

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जन हस्तक्षेप – फासीवादी मंसूबों के खिलाफ अभियान।

अमेरिका-इजरायल-ईरान युद्ध: घुटनों पर रेंग रही मोदी सरकार की विदेश नीति: जनहस्तक्षेप।

*ईरान से अमेरिका-इजरायल हार चुके हैं जंग: जनहस्तक्षेप

एआईएन/अनिल दुबे

अमेरिका-इज़रायल-ईरान युद्ध के दौरान आरएसएस-बीजेपी गठबंधन की नरेंद्र मोदी सरकार ने भारत की विदेश नीति को उस मुकाम पर पहुंचा दिया है, जहां आज वह घुटनों के बल रेंग रही है। उक्त विचार जन हस्तक्षेप द्वारा “अमेरिका एवं इज़राइली ज़ायोनिस्ट साम्राज्यवाद द्वारा ईरान पर हमला और मोदी सरकार की बहरी चुप्पी” विषय पर मंगलवार 24 मार्च 2026 को प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में आयोजित सेमिनार में डिप्लोमेट, प्रोफेसर, बुद्धिजीवी और पत्रकारों ने व्यक्त किया है। वक्ताओं ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार ने अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान पर किए गए हमले को अकारण बताया है, जबकि वार्ताएं जारी थीं। यह अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत पूर्णतः अवैध है और आक्रामकता का कृत्य है। वक्ताओं ने कहा कि ईरान पर अमेरिका और इजरायल ने हमला तो कर दिया, लेकिन बीते दिनों में जंग की जो खबरें आ रही हैं, उसमें साफ है कि अमेरिका युद्ध हार चुका है और दुनिया में एक बार फिर औपनिवेशिक युग की वापसी का उसका स्वप्न पूरा नहीं होगा।

संगोष्ठी की शुरुआत पूर्व आईएफएससी अधिकारी सांसद एवं केंद्रीय मंत्री रहे मणि शंकर अय्यर ने किया। फॉर्ब्स मैगजीन के संपादक प्रवीण साहनी, प्रख्यात पत्रकार सईद नकवी और जेएनयू टीचर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रोफेसर सईद अख्तर हुसैन ने अपने विचार व्यक्त किए।

जन हस्तक्षेप के संयोजक डॉ विकास बाजपेई (जेएनयू) ने सेमिनार का संचालन और समापन किया। इससे पूर्व वरिष्ठ पत्रकार सत्येंद्र रंजन ने चर्चा के लिए अमेरिका-इजरायल-ईरान युद्ध के दौरान अंतरराष्ट्रीय स्थिति और भारत की भूमिका पर संक्षेप में अपनी बात रखी। सेमिनार में बड़ी संख्या में पत्रकार, वकील, प्रोफेसर, बुद्धिजीवी, जागरूक नागरिक और छात्र उपस्थित थे।
वक्ताओं ने कहा कि ईरान और मध्य-पूर्व के अन्य हिस्सों में तख्तापलट, सैन्य हस्तक्षेप और एकतरफा प्रतिबंधों के जरिए अमेरिका ने बीते दशकों में इस क्षेत्र को अराजकता में धकेल दिया है।

संगोष्ठी में इस बात पर आम सहमति रही कि मौजूदा जंग ने ना केवल इस क्षेत्र की, बल्कि पूरी दुनिया में उत्पीड़ित जनता के लोकतांत्रिक और मानवाधिकारों की संभावनाओं के लिए खतरा पैदा कर दिया है।

वक्ताओं ने कहा कि अपने ऐतिहासिक गुटनिरपेक्षता और औपनिवेशिक-विरोधी विरासत को बनाए रखने के बजाय, भारत सरकार उन शक्तियों के साथ खड़ी दिखाई देती है, जो वैश्विक संप्रभुता को कमजोर कर रही हैं। आरएसएस-भाजपा नेतृत्व वाली हिंदुत्व सरकार की अमेरिका और इज़राइल के प्रति दासत्व भाव (अधीनता) न केवल राष्ट्रीय शर्म का विषय है, बल्कि इसने भारत की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को भी गहरा आघात पहुंचाया है।

‘आर्थिक ब्लैकमेल’ के आगे झुकते हुए भारत के हितों का ‘अपमानजनक समर्पण’, व्यापार समझौते में अमेरिकी दबाव के आगे झुकना, भारत की ऊर्जा सुरक्षा को अमेरिकी स्वार्थों के हवाले करना, तथा आयतुल्ला खामेनेई की हत्या और वेनेज़ुएला पर अमेरिकी हमले एवं राष्ट्रपति मादुरो के अपहरण की निंदा करने में असफल रहना। यह सभी घटनाएं मोदी सरकार की गंभीर विफलताएं हैं।
केंद्रीय मंत्री और डिप्लोमेट रहे मणि शंकर अय्यर ने कहा कि साम्राज्यवाद एक गंभीर विषय हुआ करता था, लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप ने उसे मजाक बना दिया है। वह हर दिन व हर घंटे बदल रहे हैं और ट्रंप की ही नीतियों और तौर तरीकों को मोदी ने अपनाया है।

औपनिवेशिक युग खत्म होने के दशकों बाद उन्होंने दिखा दिया है कि गुलामी क्या होती है ?. भारत की विदेश नीति चमत्कारिक हुआ करती थी, लेकिन आज उसकी कोई नीति नहीं है और यही उसकी नीति है।

उन्होंने कहा कि भारत को दुनिया की दूसरी-तीसरी अर्थव्यवस्था बनाने का सब्जबाग दिखाया जा रहा है, लेकिन भारत की जनता किस पायदान पर खड़ी है उस पर बात नहीं हो रही है। सरकार गांधी, नेहरू से लेकर लगभग 9 वें दशक तक चलती रही विदेश नीति को दिशाहीन कर चुके हैं।

आज भारत का कोई नामलेवा नहीं है। जंग रूकवाने के लिए पाकिस्तानी मध्यस्थता की बात हो रही है। उन्होंने कहा कि इजरायल को बनाते समय ब्रिटिश प्रधानमंत्री चर्चिल ने कहा था कि मिडिल ईस्ट में वह हमारा कठपुतली देश होगा, लेकिन आज ट्रंप ने अमेरिका की स्थिति यह कर दी है कि वह खुद इजरायल की कठपुतली बन गया है।

ईरान को लेकर ट्रंप और नेतन्याहू की जो सोच अथवा तथाकथित रणनीति थी वह पूरी तरह गलत साबित हुई है।
मिडिल ईस्ट मामलों के जानकार वरिष्ठ पत्रकार सईद नकवी ने कहा कि भारत और ईरान का सांस्कृतिक जुड़ाव सदियों से रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई इस पर खास तवज्जो देते थे, जिसे अब बदल दिया गया है। उन्होंने कहा कि ट्रंप “ग्रेट अमेरिका अगेन” के नारे पर सत्ता में आए थे, लेकिन आज ट्रंप की जमीन खिसक चुकी है। अमेरिका में भयानक विरोध हो रहा है।

युद्ध की रिपोर्टिंग का सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि इजरायल के तमाम शहरों में युद्ध की भयावता फैली पड़ी है, लेकिन वहां से फोटो या वीडियो नहीं भेजे जा सकते। रिपोर्टिंग करने वालों को 5 वर्ष की सजा दी जा सकती है। उन्होंने कहा कि इस युद्ध से एक और तस्वीर उभर कर सामने आई है कि अमेरिका और इज़रायल में भारी दरार दिखाई देने लगी है, जिसके आगे चलकर गंभीर परिणाम होंगे।

फोर्ब्स मैगजीन के एडिटर प्रवीण साहनी ने कहा कि आज वर्ल्ड ऑर्डर बदल रहा है और न्यू वर्ड ऑर्डर बन रहा है। दुनिया बहु ध्रुवीय हो चुकी है। अब एक देश धुरी नहीं है। चीन व रूस तेजी से उभरे हैं। चीन जिस तरह आगे बढ़ा है उससे दुनिया में उसके प्रति ईर्ष्या बढ़ी है। उन्होंने कहा कि पिछले वर्ष दिसंबर माह में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन आए थे और एक बातचीत में उन्होंने कहा था कि भारत को चीन और रूस के साथ अलायंस में रहना चाहिए, लेकिन भारत सरकार कोई विदेश नीति न होने को ही नीति बता रही है। यही नहीं युद्ध के तरीके बदल गए हैं और टेक्नोलॉजी इसका प्रमुख हिस्सा बन गया है।

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जेएनयू के प्रोफेसर सईद अख्तर हुसैन ने इंडो पर्शियन कल्चर और सभ्यता पर विस्तार से अपनी बात रखी।
डॉ विकास बाजपेई ने कहा कि दुनिया में समता, समानता, न्याय और हक को लेकर जहां भी संघर्ष हो रहे हैं जन हस्तक्षेप वहां की जनता और उस देश के संघर्ष का समर्थन करता है। यह जंग और ऐसे पिछले अन्य युद्ध संप्रभु राष्ट्रों के विरुद्ध अमेरिकी सैन्य आक्रामकता के निरंतर पैटर्न का हिस्सा रहे हैं। दुनिया भर की सरकारें गाज़ा में इज़राइल द्वारा किए गए नरसंहार की मूक दर्शक बनी रही, जबकि फिलिस्तीनी जनता ने विश्व भर के न्यायप्रिय लोगों के समर्थन से साहसिक प्रतिरोध किया। 2026 में अमेरिका ने वेनेज़ुएला और अब ईरान की संप्रभुता पर हमला किया है, जो अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर का खुला उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि देश में ऐसे राजनीतिक दल और संगठन है, जिन्हें वैश्विक समता, समानता, न्याय और हक के लिए चल रहे संघर्षों के समर्थन के लिए खड़ा होना चाहिए।

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