विधि का शासन लोकतंत्र की जीवनरेखा है। इसका उद्देश्य शक्तिशाली के विरुद्ध कमजोर की, बहुसंख्यक के विरुद्ध अल्पसंख्यक की, तथा राज्य के विरुद्ध नागरिक की रक्षा करना है। तथापि, आज असम में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में इस सिद्धांत का एक चिंताजनक उलटाव दृष्टिगोचर हो रहा है। विशेष रूप से बंगाली मूल के मुसलमानों के विरुद्ध उनके बार-बार के उकसाऊ वक्तव्य और कार्य महज़ असावधानी नहीं, बल्कि संविधान द्वारा प्रदत्त समानता के वचन पर सुनियोजित प्रहार प्रतीत होते हैं। जब सत्ता में बैठे लोग घृणा को सामान्य बना देते हैं, तो वे केवल बोलते नहीं, बल्कि पूर्वाग्रह को सार्वजनिक जीवन में संस्थागत रूप प्रदान करते हैं।
सरमा द्वारा जारी वह वीडियो, जिसमें प्रतीकात्मक रूप से अल्पसंख्यकों पर “गोली चलाने” का दृश्य प्रदर्शित किया गया, केवल एक घटना का विषय नहीं है। यह राजनीतिक प्रदर्शन के माध्यम से हिंसा के वैधीकरण का प्रश्न है। सत्तारूढ़ दल के मंचों द्वारा इस प्रकार की छवियों का प्रसार यह दर्शाता है कि अधिकार में बैठे व्यक्तियों द्वारा की गई घृणा-भाषा मात्र बयानबाज़ी नहीं, बल्कि बहिष्कार, सामाजिक बहिष्करण और यहाँ तक कि जनसंहार की उकसाहट भी हो सकती है। इसी कारण सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष दायर याचिकाओं में जवाबदेही की मांग की गई है, क्योंकि ऐसी उकसाहट के समक्ष मौन रहना सहमति के समान है।
दमन का राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य
असम में जो हो रहा है, वह देशव्यापी एक बड़े रुझान का हिस्सा है। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में बुलडोजर राजनीति से लेकर भेदभावपूर्ण नागरिकता संशोधन कानूनों तक- भारत भर में अल्पसंख्यकों को व्यवस्थित रूप से निशाना बनाया गया है। बहिष्कार की भाषा चुनावी अभियानों, प्रशासनिक कार्रवाइयों और यहां तक कि रोजमर्रा की पुलिस व्यवस्था में घुस चुकी है। मुसलमान, दलित, ईसाई और अन्य हाशिए पर पड़े समूहों को तेजी से विदेशी, देश के लिए खतरा और समान अधिकारों के अयोग्य बताया जा रहा है। स्पष्टतः यह राष्ट्रवाद के वेश में दमन है।
हमने हाल ही में उत्तराखंड के कोटद्वार में दमन की एक घटना देखी। वहां स्थानीय एक जिम के मालिक दीपक कुमार ने 70 वर्षीय मुस्लिम दुकानदार वकील अहमद की उत्पीड़न से रक्षा करने के लिए हस्तक्षेप किया। उसके बाद सांप्रदायिक तनाव भड़क उठा। कथित तौर पर बजरंग दल से जुड़े एक समूह ने अहमद पर दबाव डाला कि वे अपनी 30 वर्ष पुरानी दुकान के नाम से “बाबा” शब्द हटा दें, क्योंकि यह शब्द कथित रूप से केवल हिंदू धार्मिक व्यक्तियों के लिए आरक्षित है। टकराव के दौरान- जो वायरल वीडियो में कैद हुआ- दीपक ने बहुचर्चित एलान किया कि “मेरा नाम मोहम्मद दीपक है”। यह एक प्रतीकात्मक बयान था, जिसका उद्देश्य यह दर्शाना था कि कानून के सामने सभी नागरिक समान हैं। उनकी कार्रवाई को राष्ट्रीय प्रशंसा मिली, लेकिन इससे उन्हें व्यक्तिगत और कानूनी गंभीर परिणाम भी भुगतने पड़े। अवैध सांप्रदायिक समूह के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय, स्थानीय पुलिस ने भीड़ का सामना करने के लिए कुमार के खिलाफ एफआईआर दर्ज की। यह घटना राज्य मशीनरी के बढ़ते सांप्रदायीकरण को उजागर करती है और भारत के सभी नागरिकों की रक्षा में राज्य की भूमिका पर सवाल उठाती है।
इसी क्रम में, कथित रूप से अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं द्वारा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रख्यात इतिहासकार इरफ़ान हबीब को संबोधित एक बैठक को बाधित करने का प्रयास भी इसी व्यापक प्रवृत्ति का संकेत है। यह घटनाएँ आकस्मिक नहीं हैं, बल्कि बहुसंख्यक वर्चस्व को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से अल्पसंख्यकों के दुष्प्रचार की एक सुनियोजित राजनीतिक परियोजना का हिस्सा प्रतीत होती हैं। विधि का शासन, जो एक सुरक्षा कवच होना चाहिए, उसे हथियार में परिवर्तित किया जा रहा है।
इस खतरनाक घटना का सबसे चौंकाने वाला और दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह है कि भारतीय न्यायपालिका निचले से लेकर ऊंचे लेवल तक कानून का राज लागू करने और संविधान के सेक्युलर ढांचे की रक्षा करने की अपनी ड्यूटी से पीछे हट रही है, जो इसके बेसिक स्ट्रक्चर का एक ज़रूरी हिस्सा है और अल्पसंख्यकों को निशाना बनाकर नफरत और हिंसा करने वालों को सज़ा देना है। इस नाकामी या कभी-कभी कथित मिलीभगत ने उन ताकतों को मज़बूत किया है जो हमारी पॉलिटी का नेचर बदलना चाहती हैं और जो अपने प्रोजेक्ट के लिए कानून के राज को खत्म करने पर तुली हुई हैं।
प्रतिरोध का आह्वान
हम चुप रहने का जोखिम नहीं उठा सकते। हम उदासीनता बर्दाश्त नहीं कर सकते। प्रत्येक नागरिक एवं प्रत्येक संस्था को संवैधानिक मूल्यों की रक्षा हेतु आगे आना होगा। न्यायपालिका को निर्णायक हस्तक्षेप करना होगा, नागरिक समाज को संगठित होना होगा, और मीडिया को सहमति का माध्यम बनने से इंकार करना होगा। अल्पसंख्यकों को निशाना बनाना न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि भारत की लोकतांत्रिक प्रतिज्ञा के साथ विश्वासघात है। मौन रहना न्याय के क्षरण को स्वीकार करना है; आवाज़ उठाना भारत के विचार की रक्षा करना है।
जनहस्तक्षेप द्वारा विधि के शासन के अवमूल्यन के विरुद्ध अपना प्रतिरोध दर्ज कराने तथा सत्ताधारियों से जवाबदेही सुनिश्चित करने के उद्देश्य से एक सार्वजनिक बैठक का आयोजन किया जा रहा है। सभी लोकतांत्रिक एवं प्रगतिशील शक्तियों से इस संघर्ष में सहभागी होने का अनुरोध है, ताकि संवैधानिक अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित की जा सके।
बैठक का विवरण
दिनांक: 26 फरवरी 2026 (गुरुवार)
समय: अपराह्न 3-30 बजे
स्थान: प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, रायसीना रोड, नई दिल्ली
वक्ता:
श्री हर्ष मंदर, सेवानिवृत्त आईएएस एवं प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता।
प्रो. शम्सुल इस्लाम, सेवानिवृत्त संकाय (दिल्ली विश्वविद्यालय), लेखक एवं सांस्कृतिक कार्यकर्ता।
श्री अपूर्वानंद, प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय।
सुश्री शाहरुख आलम, अधिवक्ता एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता।
श्री अशोक पांडा, वरिष्ठ अधिवक्ता, सर्वोच्च न्यायालय तथा अन्य।
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