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नैतिकता का संकट -अब अनैतिकता ही जीवन का मूल मंत्र है

राजनीति में नैतिकता की दुहाई दी जाती है, लेकिन सत्ता के लिए साधन किसी भी हद तक इस्तेमाल होते हैं।
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नैतिकता का संकट: क्या अनैतिकता नई है या मानव सभ्यता की पुरानी विरासत?

मानव ने नैतिक मूल्यों को गढ़ा भी है और उन्हें तोड़ा भी है। जिसके पास सत्ता रही, उसी ने तय किया कि क्या सही है और क्या गलत। एक समय भारत में सती प्रथा जायज थी। 19वीं सदी में इसे रोका गया। पश्चिम में सार्वजनिक फांसी और यातनाएं ‘न्याय’ मानी जाती थीं। आज नैतिक आदर्श कई बार टूटते दिखते हैं। राजनीति में नैतिकता की दुहाई दी जाती है, लेकिन सत्ता के लिए साधन किसी भी हद तक इस्तेमाल होते हैं। गरीबी बढ़ रही है, फिर भी नैतिकता की उम्मीद की जाती है। संसाधन-युक्त लोग पर्यावरण, अर्थव्यवस्था और समाज को अधिक नुकसान पहुंचाते हैं, क्योंकि वे प्रभावित कर सकते हैं। गरीब भी अनैतिकता से बचे नहीं, लेकिन समाज के बंधन उन्हें कुछ हद तक रोके रखते हैं।

राजीव रंजन – शोध छात्र (पीएचडी), दिल्ली विश्वविद्यालय

आज बैठे-बैठे मन में एक सवाल उठा, जो धीरे-धीरे विशाल रूप ले गया। क्या नैतिकता में हरज अब-अब हुआ है, या समाज में अनैतिकता सदैव रही है? एक आम आदमी की तरह जवाब दें तो कह सकते हैं समाज में नैतिक और अनैतिक दोनों ही चीजें हमेशा रही हैं। यह आपके नजरिए पर निर्भर करता है कि आप किस चश्मे से देख रहे हैं। लेकिन यह सवाल यूँ ही नहीं उठा। जब विश्व की महाशक्तियां छोटे देशों की स्वशासन व्यवस्था को कुचलकर अपनी शर्तों पर उन्हें चलाना चाहती हैं, तब प्रश्न जागता है क्या यह कोई नई घटना है, या मानव सभ्यता की शुरुआत से यह संघर्ष चल रहा है?

मानव ने नैतिक मूल्यों को गढ़ा भी है और उन्हें तोड़ा भी है। जिसके पास सत्ता रही, उसी ने तय किया कि क्या सही है और क्या गलत। एक समय भारत में सती प्रथा जायज थी। 19वीं सदी में इसे रोका गया। पश्चिम में सार्वजनिक फांसी और यातनाएं ‘न्याय’ मानी जाती थीं। आज नैतिक आदर्श कई बार टूटते दिखते हैं। राजनीति में नैतिकता की दुहाई दी जाती है, लेकिन सत्ता के लिए साधन किसी भी हद तक इस्तेमाल होते हैं। गरीबी बढ़ रही है, फिर भी नैतिकता की उम्मीद की जाती है। संसाधन-युक्त लोग पर्यावरण, अर्थव्यवस्था और समाज को अधिक नुकसान पहुंचाते हैं, क्योंकि वे प्रभावित कर सकते हैं। गरीब भी अनैतिकता से बचे नहीं, लेकिन समाज के बंधन उन्हें कुछ हद तक रोके रखते हैं।

इस लेख में हम पश्चात्य दार्शनिकों के साथ-साथ भारतीय ग्रंथों और दार्शनिकों का सहारा लेकर, स्पष्ट आंकड़ों, परिभाषाओं और दार्शनिक मूल्यों की मदद से इस प्रश्न का विश्लेषण करेंगे। नैतिकता की दार्शनिक परिभाषा: पश्चात्य और भारतीय दृष्टि

पश्चात्य दर्शन में इमैनुएल कांट ने ‘कैटेगोरिकल इम्पेरेटिव’ की बात की‘ऐसा व्यवहार करो जो सार्वभौम नियम बन सके’। नैतिक कार्य वह है जो हर स्थिति में हर व्यक्ति के लिए सही हो, बिना स्वार्थ या परिणाम देखे। इसके विपरीत, जेरेमी बेंथम और जॉन स्टुअर्ट मिल का यूटिलिटेरियनिज्म कहता है नैतिकता का मापदंड ‘सबसे अधिक लोगों का अधिकतम सुख’ है। साधन चाहे जो भी हो, परिणाम अच्छा तो नैतिक।

फ्रेडरिक नीत्शे ने ‘मास्टर-स्लेव मोरैलिटी’ दी। सत्ता-युक्त वर्ग (मास्टर) अपनी परिभाषा थोपता है जो उसके लिए लाभदायक, वह ‘अच्छा’; जो कमजोरों के लिए, वह ‘बुरा’। माकियावेली के ‘द प्रिंस’ में लिखा‘साध्य साधनों को न्यायसंगत ठहराता है’। थॉमस हॉब्स के ‘लेविथान’ में राज्य के बिना ‘सभी के विरुद्ध सभी’ की स्थिति होती है, जहां नैतिकता सिर्फ सत्ता का औजार है।

भारतीय दर्शन में ‘धर्म’ नैतिकता का सबसे निकट शब्द है। भगवद्गीता में भगवान कृष्ण अर्जुन से कहते हैं‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’ (कर्म में ही तुम्हारा अधिकार है, फल में कभी नहीं)। नैतिकता निष्काम कर्म में है। महाभारत युधिष्ठिर के ‘धर्म-संकट’ से भरा है क्या युद्ध नैतिक है? चाणक्य के अर्थशास्त्र में व्यावहारिक नैतिकता है। राजा को प्रजा की रक्षा के लिए कठोर निर्णय लेने पड़ सकते हैं, लेकिन स्वार्थ के लिए नहीं। उपनिषदों में ‘सत्यमेव जयते’ का आदर्श है, लेकिन वास्तव में ‘असत्’ भी चलता है। रामायण में राम का ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ होना नैतिकता का प्रतीक है, जबकि रावण की सत्ता-लिप्सा अनैतिकता। बौद्ध और जैन दर्शन अहिंसा और करुणा पर जोर देते हैं, लेकिन वास्तविक जीवन में सत्ता इन्हें चुनौती देती है।

इस प्रकार, नैतिकता न व्यक्तिगत है, न पूर्णतः सामाजिक। यह सत्ता, संसाधन और संदर्भ पर निर्भर करती है। वैसे तमाम उदाहरण दिए जा सकते हैं उन सभी में यह एक ऐतिहासिक उदाहरण का प्रमाण मिलता है : अनैतिकता सदैव रही भारत में सती प्रथा को 1829 तक जायज माना जाता था। लॉर्ड विलियम बेंटिंक ने इसे रोका। उस समय की सत्ता और धर्म-व्यवस्था के अनुसार यह ‘पतिव्रता’ का प्रतीक था, लेकिन आधुनिक मानवाधिकार के अनुसार अनैतिक। महाभारत में द्रौपदी का चीरहरण और गीता का युद्ध-धर्म इसी द्वंद्व को दिखाते हैं।

पश्चिम में मध्ययुग तक सार्वजनिक यातनाएं ‘न्याय’ थीं। फ्रांस की गिलोटिन, इंग्लैंड की टायर बर्निंगये अपराध रोकने के साधन थे। औपनिवेशिक काल में ब्रिटिश साम्राज्य ने ‘सिविलाइजिंग मिशन’ के नाम पर भारत लूटा। आज रूस-यूक्रेन, अमेरिका-मध्य पूर्व, चीन-ताइवान में बड़े देश छोटों की स्वतंत्रता पर हस्तक्षेप करते हैं। रोमन साम्राज्य, मुगल, ब्रिटिश सभी ने अपनी नैतिकता थोपी।

वर्तमान समय: सत्ता, गरीबी और नैतिकता

आज राजनीति में ‘एंड्स जस्टिफाई मीन्स’ प्रबल है। चुनावों में नैतिकता की दुहाई दी जाती है, लेकिन झूठ, प्रचार और धनबल चलता है। विश्व असमानता रिपोर्ट 2026 के अनुसार, दुनिया की सबसे अमीर 10% आबादी के पास 75% संपत्ति है, जबकि सबसे गरीब 50% के पास मात्र 2%। टॉप 0.001% (करीब 60,000 लोग) के पास गरीब आधी दुनिया से तीन गुना अधिक संपत्ति है।भारत में विश्व बैंक के अनुसार, 2022 में गिनी इंडेक्स 25.5 है—दुनिया में चौथा सबसे कम। 2011-23 के बीच 17.1 करोड़ लोग अत्यधिक गरीबी से बाहर निकले और गरीबी दर 16.2% से घटकर 2.3% रह गई। लेकिन असमानता बनी हुई है।पर्यावरण में टॉप 1% का कार्बन उत्सर्जन निचले 50% से 75 गुना अधिक है। टॉप 1% ग्लोबल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का 41% जिम्मेदार है (प्राइवेट कैपिटल ओनरशिप आधार पर)। अमीर वर्ग की खपत से जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और जैव विविधता हानि हो रही है।भ्रष्टाचार में ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के करप्शन पर्सेप्शंस इंडेक्स 2025 में भारत का स्कोर 39 है, रैंक 91/182। बड़े घोटाले अमीर वर्ग द्वारा ही होते हैं। व्हाइट-कॉलर क्राइम का नुकसान स्ट्रीट क्राइम से कहीं अधिक है।अमीर बनाम गरीब: नैतिकता का हनन किसका अधिक?

मात्रात्मक रूप से संसाधन-युक्त लोग अधिक अनैतिकता करते हैं। वे पर्यावरण, अर्थव्यवस्था और राजनीति को प्रभावित करते हैं। उदाहरण: एनरॉन, VW डीजल गेट मुनाफे के लिए कानून तोड़े गए। युद्ध: बड़ी शक्तियां छोटे देशों पर हस्तक्षेप तेल और संसाधन के लिए।

गरीबों में अनैतिकता ‘आवश्यकता’ से प्रेरित होती है चोरी, डकैती। लेकिन वे धर्म, रीति-रिवाज और सामाजिक बंधनों से बंधे रहते हैं। शिक्षा-स्वास्थ्य की कमी उन्हें कमजोर बनाती है। महाभारत में भी गरीब और दीन-दुखी की रक्षा का कर्तव्य राजा पर डाला गया है, लेकिन सत्ता-युक्त ही इसे तोड़ते हैं।

भारतीय ग्रंथों से सबक

गीता कहती है नैतिकता कर्तव्य में है, फल में नहीं। लेकिन युधिष्ठिर का ‘अश्वमेध यज्ञ’ और द्रौपदी का अपमान दिखाते हैं कि सत्ता नैतिक संकट पैदा करती है। चाणक्य कहते हैं राजा को प्रजा की भलाई के लिए कठोर कदम उठाने चाहिए, लेकिन स्वार्थ नहीं। मनुस्मृति में वर्ण-व्यवस्था नैतिकता को सामाजिक बनाती है, लेकिन आज यह विभेदकारी साबित हुई। कबीर दास ने सत्ता की आलोचना की ‘कबीरा खड़ा बाजार में, मांगे सबकी खैर’।

निष्कर्ष: नैतिकता संदर्भ-आधारित है, लेकिन उद्देश्यपूर्ण नैतिकता (objective ethics) की जरूरत है जो सत्ता से ऊपर हो।

समाधान की दिशा ,समाज को नैतिक बनाने के लिए: शिक्षा और स्वास्थ्य सभी तक पहुंचाएं। असमानता कम करें कर सुधार, संपत्ति वितरण। सत्ता पर निगरानी स्वतंत्र मीडिया, न्यायपालिका।

नैतिकता का हनन नई बात नहीं। यह सभ्यता की शुरुआत से है। विश्व असमानता रिपोर्ट 2026 और विश्व बैंक के आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि संसाधन-युक्त वर्ग इसका अधिक जिम्मेदार है। फिर भी गरीब भी इससे बचे नहीं। उद्देश्यपूर्ण दृष्टि अपनाकर हम बेहतर समाज बना सकते हैं जहां सत्ता नैतिकता का सेवक बने, न कि स्वामी।

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