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शारजील इमाम की जमानत पर दिल्ली उच्च न्यायालय का धन्यवाद – भाई की शादी में शामिल होने के लिए दिया अंतरिम जमानत।

घर के लोग जहां न्यालनय को धन्यवाद कह रहे है वहीं गाँव मे हज़ारों हाँथ शारजील की रिहाई के लिए दुआओं के लिए उठे।
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 6 वर्षों बाद घर मे लौटी खुशियां – गांव काको की फिज़ाओं में लौटा एक मुसर्रत भरा पैग़ाम ।

एआईएन – की समीक्षा

एक ओर 6 वर्षों का ग़मो दर्द का बोझ लिए कैद से बाहर हुए तो वहीं दूसरी ओर उसी दिलो दिमाग़ पर फिर से वापसी का दर्द का शिकन चेहरे पर झलकता तो उसी चेहरे पर वह खुशी 6 वर्षों से बेटे की सलामती के साथ घर की वापसी खैर खूबी से रिहाई की दुआओं में हाँथ उठाये घर बैठी मां के आंचल से लिपट कर हिचकी के साथ रोने की तड़प वह दृश्य मां बेटे का मिलन बयान नहीं क्या जा सकता है। न्यायालय का धन्यवाद जिसने बेगुनाह मुजरिम को 6 वर्षों से बिना ट्रायल के जेल बन्द करके मुजरिम के भाई की शादी में शामिल होने के लिए 10 की जमानत दिया कोटि कोटि न्यायालय को धन्यवाद, धन्यवाद इसलिये भी की दुष्कर्मियो और हत्यारे को पेरोल पर परमानेंट जामात पर स्वतंत्र और निर्दोष को शर्तों के साथ 10 दिनों की ज़मानत। कोटि कोटि नमन न्यायालय को!!!! यह विडंबना नहीं तो और क्या है? यह न्याय का दुर्भगय नही तो और क्या है?

सैय्यद आसिफ़ इमाम काकवी ✍️

बहरहाल “कुछ वापिसियाँ सिर्फ़ कदमों की आहट नहीं होतीं, वो बरसों की दुआओं का कबूल होना होती हैं रमज़ान का मुक़द्दस महीना अलविदा जुमा का दिन और उसी दिन एक ऐसी खबर जिसने काको की सरज़मीं को खुशी, सुकून और जज़्बात से भर दिया। छह साल बाद शरजील इमाम अपने आबाई वतन काको लौटे अपने छोटे भाई मुज़म्मिल इमाम की शादी में शरीक होने और अपनी बीमार मां के साथ कुछ पल सुकून के बिताने के लिए।

दिल्ली की अदालत से मिली 10 दिनों की अंतरिम राहत ने सिर्फ़ एक शख्स को घर आने का मौका नहीं दिया, बल्कि एक मां की सूनी आंखों में रौशनी लौटा दी, एक घर की खामोश दीवारों को फिर से हंसी से भर दिया, और एक पूरे कस्बे को जश्न का एहसास दे दिया।

काको यह नाम सिर्फ़ एक जगह का नहीं, बल्कि एक तहज़ीब, एक पहचान और इल्म-ओ-अदब की रौशन परंपरा का प्रतीक है। इस मिट्टी ने हमेशा से मोहब्बत, भाईचारे और इंसानियत का पैग़ाम दिया है। यहाँ की गलियों में सिर्फ़ लोग नहीं चलते, बल्कि रिश्ते चलते हैं, यादें चलती हैं और एक-दूसरे के लिए दिलों में जगह चलती है। इसी मिट्टी का एक बेटा, जिसे मैंने बचपन से जाना शरजील इमाम।

हमारे घरों के बीच फासला भले ही कुछ कदमों का रहा हो, मगर वक्त ने मुलाक़ातों में दूरी ला दी थी। कभी वो काको आए तो मैं नहीं, कभी मैं आया तो वो नहीं। लेकिन इस बार जब मुलाक़ात हुई, तो लगा जैसे वक्त थम गया हो। वही मासूमियत, वही सादगी, वही बड़ों का अदब और छोटों से मोहब्बत कुछ भी नहीं बदला।

आज भी वो हर किसी से उसी तपाक से मिलते हैं, जैसे पहले मिलते थे। मेरी इस मुलाक़ात में सबसे खास बात यह रही कि उन्होंने मेरे तमाम दोस्तों का हाल पूछा खासतौर पर मेरे गैर-मुस्लिम दोस्तों का। हर नाम उन्हें याद था, हर रिश्ता उन्हें अजीज था। यह वो तस्वीर है जो जमीनी हकीकत में नजर आती है एक पढ़े-लिखे, सलीकेदार और मोहब्बत करने वाले इंसान की। हमारी लंबी बातचीत हुई खालिस दिल से, बिना किसी बनावट के।

उन्होंने मेरे बेटे से भी बात की, उसे तालीम की अहमियत समझाई और खूब पढ़ने के लिए कहा। यह एक ऐसे इंसान की पहचान है, जो खुद इल्म से जुड़ा हो और चाहता हो कि आने वाली नस्लें भी उसी रास्ते पर चलें।उन्होंने अपने भाई मुज़म्मिल इमाम की भी दिल खोलकर तारीफ की कैसे उन्होंने घर को संभाला, मां का ख्याल रखा। यह सुनकर एहसास हुआ कि मुश्किल वक्त में रिश्तों की असल ताकत सामने आती है।

ईद के दूसरे दिन भी मुलाक़ात हुई और उस मुलाक़ात में एक अलग ही अपनापन था। उन्होंने मुझे शादी की दावत दी और बड़े ही प्यार से कहा दुआ में याद रखिएगा… यह अल्फ़ाज़ आज भी दिल में गूंज रहे हैं।

उन्होंने सिर्फ़ मुझे ही नहीं, बल्कि मेरे क़रीबियों को भी अपनी दुआओं में शामिल रखने की बात कही। यह उनकी फितरत है अपने से ज्यादा दूसरों के लिए सोचना। काको की फिज़ाओं में आज जो खुशी है, उसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है। हर गली में चर्चा है, हर दिल में सुकून है।

हिंदू हो या मुस्लिम हर कोई उन्हें एक पढ़े-लिखे नौजवान, एक IIT ग्रेजुएट और एक रोल मॉडल के तौर पर देखता है। यह काको की खूबसूरती है यहाँ इंसानियत मज़हब से ऊपर है, और रिश्ते दिल से बनते हैं। लेकिन इस खुशी के पीछे एक दर्द भी है एक ऐसा दर्द जो हर उस दिल ने महसूस किया है, जिसने किसी अपने का इंतज़ार किया हो।

छह साल… यह सिर्फ़ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि अनगिनत अधूरी ईदों, सूनी खुशियों और मां की आंखों के आंसुओं की कहानी है। जब लोग ईद पर गले मिलते थे, उस वक्त एक मां अपने बेटे की तस्वीर से लिपटकर रोती थी।

जब घरों में सिवइयां पकती थीं, उस घर का एक कोना खामोश रहता था। आज जब वही बेटा घर लौटा है, तो हर आंख नम है मगर इन आंसुओं में ग़म नहीं, बल्कि सुकून और शुक्र का एहसास है।

काको हमेशा से इल्म-ओ-अदब का गहवारा रहा है। यहाँ से कई नामी शख्सियतों ने अपनी पहचान बनाई, समाज को रास्ता दिखाया और इंसानियत का पैग़ाम दिया। शरजील इमाम भी उसी सिलसिले की एक कड़ी हैं एक ऐसा नाम जिसे यहां के बच्चे तालीम और मेहनत की मिसाल के तौर पर देखते हैं।

मीडिया और सियासत की अपनी-अपनी तस्वीरें हो सकती हैं, लेकिन काको के लोगों के दिलों में जो तस्वीर है, वह एक अपने बेटे की है एक ऐसे इंसान की, जो मोहब्बत करना जानता है, रिश्तों की कद्र करना जानता है और इल्म को अपनी पहचान मानता है।

आज काको की सरज़मीं गवाह है खुशी की, राहत की और उस उम्मीद की, जो बरसों बाद फिर से जागी है। दिल से दुआ निकलती है या अल्लाह, हर मां के आंचल को खुशियों से भर दे, हर इंतज़ार को खत्म कर दे,और हर उस दिल को सुकून दे, जो अपनों की राह देख रहा है… यह 10 दिन भले ही छोटे हों, मगर इनकी अहमियत एक पूरी जिंदगी के बराबर है। उम्मीद है कि यह राहत एक शुरुआत बने एक नई सुबह की, एक नई जिंदगी की।

काको की मिट्टी में सिर्फ़ खुशबू नहीं, दुआओं का असर भी बसता है जो यहां से जुड़ जाता है,वो कभी जुदा नहीं होता आज काको सिर्फ़ एक जगह नहीं, एक एहसास है मोहब्बत का, इल्म का और उम्मीद का…

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