धर्म का स्वरूप: सेवा या स्वार्थ? डॉ प्रियंका सौरभ भारत को सदियों से धर्म, आस्था और आध्यात्म की भूमि माना जाता रहा है। यहाँ धर्म केवल पूजा-पाठ या कर्मकांड तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जीवन के हर पक्ष को दिशा देने वाला तत्व रहा है। आस्था ने व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों में संबल दिया, उसे […]
नया लोकतंत्र? (संपादकीय स्थान रिक्त है) “जब कलम चुप हो जाए: लोकतंत्र का शोकगीत” आपातकाल के दौरान अख़बारों ने विरोध में अपना संपादकीय कॉलम ख़ाली छोड़ा था। आज औपचारिक सेंसरशिप नहीं है, लेकिन आत्म-सेन्सरशिप, भय और ‘राष्ट्रभक्ति’ के नाम पर विचारों का गला घोंटा जा रहा है। सवाल पूछना देशद्रोह बन गया है, […]
