
एआईएन/संवादाता
नई दिल्ली – 17 मार्च को दिल्ली के राज्य बनने, पहली विधानसभा गठित होने की 75 वीं वर्षगांठ पर शहरी मामलों के जानकार एवं एकीकृत दिल्ली नगर निगम की निर्माण समिति के अध्यक्ष रहे जगदीश ममगांई की पुस्तक ‘‘ज़ख़्मों से जूझती दिल्ली” – “उम्मीदें ज़िन्दा” हैं’ को दिल्ली को समर्पित किया गया। इस अवसर पर दिल्ली नगर निगम में दूरदर्शन व अख़बार से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार उमेश जोशी, संसद टीवी के वरिष्ठ पत्रकार मनोज वर्मा, दैनिक हिन्दुस्तान के वरिष्ठ पत्रकार रामनारायण श्रीवास्तव, प्यारा उत्तराखण्ड के संपादक देव सिंह रावत, संवाद सिंधी के संपादक श्रीकान्त भाटिया, पूर्व महापौर मीरा अग्रवाल, दिल्ली नगर निगम की महिला कल्याण व बाल विकास की अध्यक्ष रही मालती वर्मा, दिल्ली नगर निगम की सिटी जोन की अध्यक्ष रही रेणुका गुप्ता सहित कई पार्षद, सामाजिक संगठनों व आरडब्लयू के प्रतिनिधि, वरिष्ठ पार्षद उपस्थित रहे, संचालन सहकार भारती के दिल्ली प्रांत अध्यक्ष धर्मवीर सिंह ने की।
शहरी मामलों के जानकार व लेखक जगदीश ममगांई ने कहा, राजधानी होने के साथ दिल्ली स्वयं में भी एक प्रदेश है। यहां का प्रशासन त्रिश्रेणी यानी केन्द्र सरकार, राज्य सरकार व स्थानीय निकाय दिल्ली का प्रशासनिक प्रबंधक देखते हैं। प्रशासनिक रुप से दिल्ली की स्थिति बहुत जटिल है, यह राज्य है और केन्द्र शासित भी है। राज्य सरकार चर्चा मंच है और थोड़ा बहुत दिल्ली नगर निगम से झपटे हुए अधिकारों का प्रतिपादन करती है। दिल्ली में राज्य सरकार तो है, लेकिन भूमि, क़ानून-व्यवस्था, सर्विसेज पर उसका कोई नियंत्रण नहीं है जो किसी भी शासन, प्रशासन व्यवस्था को कारगर बनाने, चलाने के लिए जरुरी हैं। दिल्ली विधानसभा को उन मामलों में भी कोई विधायी संप्रभुता प्राप्त नहीं है जिन पर वह क़ानून बनाने के लिए सक्षम है। सदन व कैबिनेट में ले जाने वाले गैर-आरक्षित विषयों से संबद्ध प्रस्तावों व निर्णयों पर भी उपराज्यपाल की पूर्वानुमति आवश्यक है। दिल्ली में बहु निकायों का दखल है, बहुत सारे प्राधिकरण हैं पर कोई जवाबदेही नहीं है। दिल्ली सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में है, हालांकि दिल्ली का अपना कुछ भी नहीं है न मौसम, न प्रदूषण, न जनसंख्या। दिल्ली पर केन्द्र सरकार का अंकुश तो है, 20 किलोमीटर लंबी मुनक नहर का रखरखाव, सुरक्षा तथा आईटीओ बैराज का रखरखाव हरियाणा सरकार के पास है। दिल्ली में पीने के पानी की आपूर्ति में कमी के साथ बाढ़ की स्थिति के लिए भी हरियाणा की भूमिका है। प्रदूषण के मामले में तो हरियाणा के साथ पंजाब व राजस्थान तक योगदान करता है।
जगदीश ममगांई ने कहा कि केन्द्र की सत्ता में आते ही, वही पार्टियां जो विपक्ष में रहते हुए राज्य का दर्जा देने का समर्थन करती हैं, पुरजोर मांग करती हैं, सरकार में आते ही राज्य का दर्जा देने की मांग को छोड़ देती हैं! हर केन्द्र सरकार दिल्ली पर अपना अधिकार चाहती है, नियंत्रण बनाए रखना चाहती है लेकिन प्राप्त अधिकारों से दिल्लीवासियों को राहत, संरक्षण नहीं देती है। दिल्ली राज्य नहीं है, यह एक केन्द्र शासित प्रदेश है लेकिन इसमें एक निर्वाचित विधानमंडल है जिसकी दिल्लीवासियों के प्रति जिम्मेदारी है। अधिकार के साथ कर्तव्य की भी पालना हो तो अधिकार केन्द्र सरकार के पास रहें या दिल्ली सरकार के पास, यदि दिल्लीवासी प्रभावित नहीं होंगे, तो उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ेगा। भूमि, भवन अधिनियम केन्द्र सरकार के अधीन हैं, राजनेता, पुलिस, नौकरशाह, भूमाफिया की मिलीभगत व फर्जीवाड़ा से बड़े पैमाने पर सरकारी जमीन पर अवैद्य झुग्गियाँ, अनधिकृत कॉलोनियां बस गई। केन्द्र सरकार की एजेंसियों की लाखों वर्ग मीटर जमीन पर अवैद्य कब्जे हो गए लेकिन केन्द्र सरकार अरबों रु की अपनी जमीन बचाने के प्रति उदासीन रही। हरित क्षेत्र रिज में भी वन विभाग की जमीन पर अवैद्य कब्जे हो गए, पेड़ कट गए व अनधिकृत कॉलोनियां बस गई। दिल्ली हाई कोर्ट व सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद अतिक्रमण व अवैद्य निर्माण के लिए जिम्मेदार भूमाफिया एवं दोषी अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई नहीं हुई जिससे सरकारी जमीन पर कब्ज़ा करने वालों के हौंसले बढ़ गए, क़ानून का डर समाप्त हो गया।
ममगांई ने कहा कि राजधानी बसाने के लिये नई दिल्ली क्षेत्र के गाँव रायसीना, मालचा, कुशक, पिलंजी, दसगरा, तालकटोरा और मोतीबाग की ज़मीन को तोपों से ध्वस्त कर ब्रिटिश शासन ने जबरन किसानों से अधिग्रहित की। डीडीए ने विकास के नाम पर गाँवों की संपत्ति का औने-पौने मुआवजे पर अंधाधुंध अधिग्रहण किया, वैकल्पिक प्लॉट व परिवार में एक रोजगार का भरोसा दिया गया जो बस ज़ुबानी खर्च तक सीमित रहा। अधिग्रहित जमीन पर विकास योजनाएं न आने से डीडीए व पुलिस कर्मियों के सहयोग से ज़मीनों पर कब़्जे कर बेच, अनधिकृत निर्माण हो गए।
जगदीश ममगांई ने कहा कि दिल्लीवासियों ने देश की आज़ादी में रक्त ईरान के बादशाह नादिर शाह ने संपूर्ण दिल्ली में 57 दिनों तक नरसंहार किया जिसमें करीब 300,000 पुरुषों, महिलाओं और बच्चों का कत्ल किया गया, 1857 के विद्रोह के बाद कूचा चेलां के 1400 निवासियों को गिरफ़्तार कर यमुना नदी के तट पर ले जा कर तोपों से उन पर बमबारी की गई और लाशों को नदी में फेंक दिया, कूचा चेलां का कुंआ महिलाओं और बच्चों के शवों से भर गया। दिल्ली में हुए कत्ले-आम में करीब 6,000 क्रांति सिपाही व 22,000 नागरिकों को मौत के घाट उतारा गया। पुराना शहर के पेड़ों व खंबों पर क्रांति समर्थकों की लाशें लटका दी गई। दिल्ली के अलीपुर गाँव को विद्रोही घोषित कर क्रांति में शामिल 78 निवासियों को फांसी दी गई। चन्द्रावल गाँव के स्त्री पुरुषों को बेरहमी से मौत के घाट उतार, गाँव को जला कर खाक कर दिया। मेटकाफ हाउस और वज़ीराबाद के लोगों पर शस्त्रागार को लूटने का आरोप लगा दयाराम खारी समेत 22 लोगों को फाँसी दी गई। फरवरी 1858 में बसंत पंचमी के दिन दिल्ली के गाँव फतेहपुर बेरी के 12 वर्ष की आयु तक के जो पुरुष और स्त्री पकड़ में आए, को कंपनी सेना ने मौत के घाट उतार दिया। ममगांई ने कहा कि दुर्भाग्य है कि दिल्ली में बर्बर ब्रिटिश अधिकारी जॉन निकोलसन, कर्नल जेम्स स्किनर, लेफ्ट फिलिप सल्कल्ड, पीवीटी जॉन परसेल, एंड्रयू फिजिग्बन, एवार्ड अलॉयसियस लिस्ले फिलिप्स जैसे कुख्यात ब्रिटिश सैन्य अधिकारी जिन्होंने क्रांतिकारियों की नृशंस हत्या की, विशेषकर निर्दोष भारतीय महिलाओं व बच्चों का नरसंहार किया, उनकी कब्रगाह बना संरक्षण में धनराशि खर्च, महिमामंडित किया जा रहा है।
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