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बिहार के युवाओं की आवाज़ दबाने की कोशिश और युवाओं का अंधकारमय भविष्य, क्या बिहार भाजपा सरकार की नई योजना है?

बिहार के शिक्षित युवा और मनरेगा से वंचित बेरोजगार मजदूर बिहार से पलायन करने पर विवश हैं

लाठी नहीं, रोजगार चाहिए।बिहार को शिक्षा स्वास्थ्य और स्वयरोज़गार चाहिए।

बिहार के युवाओं की आवाज़ और टूटते भरोसे की कहानी

सैयद आसिफ़ इमाम काकवी

पटना की सड़कों पर एक बार फिर वही तस्वीर दिखाई दी, जो पिछले कई वर्षों से बिहार के युवाओं की तक़दीर बनती जा रही है। हाथों में डिग्रियां थीं, आंखों में उम्मीदें थीं, और दिल में अपने भविष्य को संवारने का सपना था। लेकिन इन सपनों का स्वागत फूलों से नहीं, बल्कि लाठियों से हुआ। शिक्षक भर्ती प्रक्रिया को जल्द पूरा कराने की मांग को लेकर सड़क पर उतरे युवाओं पर जिस तरह पुलिस ने कार्रवाई की, उसने सिर्फ शरीरों को घायल नहीं किया, बल्कि लाखों युवाओं के भरोसे को भी गहरी चोट पहुंचाई है। TRE-4 भर्ती को लेकर प्रदर्शन कर रहे अभ्यर्थियों की मांग कोई गैरकानूनी मांग नहीं थी। वे नौकरी मांग रहे थे, भीख नहीं। वे अपने अधिकार की बात कर रहे थे, किसी पर एहसान नहीं। लेकिन अफसोस कि आज के दौर में बेरोजगार युवा जब अपनी आवाज़ बुलंद करता है, तो उसे अक्सर “व्यवस्था बिगाड़ने वाला” बताकर दबाने की कोशिश की जाती है। यही वजह है कि पटना की सड़कों पर आज फिर युवाओं का दर्द साफ दिखाई दिया।
सरकारें बदलती हैं, चेहरे बदलते हैं, चुनावी नारे बदलते हैं, लेकिन युवाओं की तकलीफ नहीं बदलती। चुनाव के समय मंचों पर बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं। कभी हिंदू-मुस्लिम की बातें होती हैं, कभी जाति और घुसपैठियों के नाम पर राजनीति गर्म होती है। लेकिन जब वही युवा नौकरी, शिक्षा और अपने भविष्य का सवाल लेकर सामने आता है, तब जवाब देने के बजाय लाठियां चलाई जाती हैं। यही आज के लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना बनती जा रही है। बिहार का युवा सिर्फ भावनाओं में बहने वाला युवा नहीं रहा। वह अब सवाल पूछ रहा है। वह जानना चाहता है कि आखिर उसकी मेहनत का परिणाम कब मिलेगा? लाखों छात्र-छात्राएं वर्षों तक तैयारी करते हैं, फॉर्म भरते हैं, परीक्षा देते हैं, रिजल्ट का इंतजार करते हैं, लेकिन भर्ती प्रक्रियाएं या तो लटक जाती हैं या विवादों में फंस जाती हैं। धीरे-धीरे उनकी उम्र निकल जाती है, घर की जिम्मेदारियां बढ़ जाती हैं और सपने टूटने लगते हैं। आज बिहार ही नहीं, पूरे देश का युवा रोजगार की लड़ाई लड़ रहा है। गांवों से लेकर शहरों तक हर घर में एक ऐसा नौजवान मौजूद है, जिसने पढ़ाई पूरी कर ली है लेकिन नौकरी का इंतजार खत्म नहीं हुआ। मां-बाप अपनी जमा पूंजी बच्चों की पढ़ाई पर खर्च करते हैं, इस उम्मीद में कि एक दिन उनका बेटा या बेटी नौकरी पाकर घर की हालत बदलेगा। लेकिन जब वर्षों तक सिर्फ आश्वासन मिलता है और नियुक्ति पत्र नहीं, तब निराशा गुस्से में बदल जाती है। पटना में TRE-4 को लेकर हुए प्रदर्शन के बाद पुलिस द्वारा छात्र नेता दिलीप कुमार समेत चार नामजद और करीब पांच हजार अज्ञात अभ्यर्थियों पर केस दर्ज किया जाना भी कई सवाल खड़े करता है। आखिर अपने हक़ की मांग करना कब से जुर्म हो गया? अगर युवा अपनी नौकरी, अपने भविष्य और अपने अधिकार की बात करेगा तो क्या उसके खिलाफ मुकदमे दर्ज होंगे? क्या लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध बनता जा रहा है? यह सच है कि कानून व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन की जिम्मेदारी है। लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सच है कि सरकार की पहली जिम्मेदारी अपने युवाओं को सम्मान और अवसर देना है। बेरोजगार युवा जब सड़क पर उतरता है, तो वह सिर्फ नारे नहीं लगाता, बल्कि अपने टूटते भरोसे की आवाज़ उठाता है। वह यह बताने की कोशिश करता है कि उसके धैर्य की भी एक सीमा है। मैं, सैयद आसिफ़ इमाम काकवी, बिहार के शिक्षा मंत्री से दिल से यह अनुरोध करता हूं कि इस पूरे मामले को सिर्फ कानून व्यवस्था के चश्मे से न देखा जाए। जिन पुलिसकर्मियों ने छात्रों पर लाठीचार्ज किया, उनकी भूमिका की निष्पक्ष जांच हो और अगर कहीं अति हुई है तो कार्रवाई भी हो। क्योंकि शिक्षक बनने का सपना देखने वाले युवाओं के साथ अपराधियों जैसा व्यवहार किसी भी संवेदनशील समाज के लिए अच्छी तस्वीर नहीं पेश करता। सरकार को यह समझना होगा कि युवा किसी भी राज्य और देश की सबसे बड़ी ताकत होते हैं। अगर वही युवा निराश और हताश हो जाएं, तो विकास के सारे दावे कमजोर पड़ जाते हैं। बिहार के युवाओं को सिर्फ भाषण नहीं चाहिए, उन्हें अवसर चाहिए। उन्हें तारीख पर तारीख नहीं, नियुक्ति पत्र चाहिए। उन्हें लाठी नहीं, रोजगार चाहिए। आज जरूरत इस बात की है कि राजनीति असली मुद्दों पर लौटे। मंदिर-मस्जिद, जाति और धर्म की बहसों से ऊपर उठकर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बेहतर व्यवस्था पर गंभीर चर्चा हो। क्योंकि भूख किसी धर्म को नहीं पहचानती और बेरोजगारी किसी जाति को देखकर दर्द नहीं देती। एक बेरोजगार युवा सिर्फ नौकरी चाहता है, ताकि वह अपने परिवार का सहारा बन सके और सम्मान के साथ जिंदगी जी सके। बिहार का युवा अब जाग चुका है। वह अब सिर्फ नारों से संतुष्ट नहीं होगा। वह सवाल पूछेगा, जवाब मांगेगा और अपने अधिकार की आवाज़ बुलंद करेगा। यही लोकतंत्र की असली ताकत भी है। एक मजबूत लोकतंत्र वही होता है जहां सरकार से सवाल पूछने वालों को दुश्मन नहीं समझा जाता, बल्कि उनकी आवाज़ को सुना जाता है। आज पटना की सड़कों पर गूंजती आवाज़ सिर्फ TRE-4 अभ्यर्थियों की आवाज़ नहीं थी। वह पूरे बिहार के युवाओं की आवाज़ थी। वह उन लाखों सपनों की आवाज़ थी जो वर्षों से इंतजार में हैं। सरकार अगर सच में “युवा बिहार” बनाना चाहती है, तो उसे युवाओं के आंसुओं को समझना होगा, उनकी पीड़ा को महसूस करना होगा और भर्ती प्रक्रियाओं को समय पर और पारदर्शी तरीके से पूरा करना होगा।
क्योंकि आखिर में इतिहास उन्हीं सरकारों को याद रखता है, जिन्होंने युवाओं को डराया नहीं, बल्कि उन्हें आगे बढ़ने का अवसर दिया।

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