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अलविदा ऐ माह-ए-रमज़ान और मरहबा ऐ खुशियों की ईद

क्योंकि…ये महीने फिर आएँ या न आएँ ये मौके फिर मिलें या न मिलें जसारत अलविदा कहने की आख़िर मैं करूँ कैसे मेरी मग़मूम आँखों से नदी अश्कों की जारी है
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अलविदा ऐ माह-ए-रमज़ान और मरहबा ऐ खुशियों की ईद

सैयद आसिफ इमाम काकवी✍️

दिल भारी है, आँखें नम हैं, और रूह में एक अजीब सी बेचैनी है ये वो लम्हे हैं जब इंसान महसूस करता है कि उसने कितना पाया और शायद कितना खो दिया माह-ए-मुबारक का आख़िरी अशरा चल रहा है ये वही अशरा है जिसमें रहमत अपनी इंतिहा पर होती है, मग़फ़िरत के दर खुल जाते हैं, और जहन्नम से आज़ादी की खुशख़बरी दी जाती है।

यही वो वक्त है जब बंदा अपने रब के सबसे करीब होता है जब दुनियावी शोर से दूर होकर एतिकाफ़ में बैठकर सिर्फ अपने खालिक से बातें करता है जब आँसू ही दुआ बन जाते हैं और खामोशी ही इबादत ये वही अशरा है जिसमें शब-ए-क़द्र छुपी है।

एक ऐसी रात… जो हजार महीनों से बेहतर है एक ऐसी रात जिसमें मुकद्दर लिखे जाते हैं एक ऐसी रात जिसमें झुका हुआ सर, रोती हुई आँखें और टूटा हुआ दिल भी क़बूल हो जाता है आज ज़रूरत है कि हम खुद को पूरी तरह अल्लाह के हवाले कर दें अपने गुनाहों की माफी माँगें और सच्चे दिल से ये दुआ करें कि या अल्लाह हमें जहन्नम की आग से बचा ले, और अपनी रहमत में जगह अता फरमा।

क्योंकि…ये महीने फिर आएँ या न आएँ ये मौके फिर मिलें या न मिलें जसारत अलविदा कहने की आख़िर मैं करूँ कैसे मेरी मग़मूम आँखों से नदी अश्कों की जारी है रमज़ानुल मुबारक का पाक महीना अब हमसे विदाई की ओर है दिल अजीब सी कैफ़ियत में है एक तरफ़ रूहानी सुकून, तो दूसरी तरफ़ जुदाई का ग़म ये वही महीना था, जिसमें हर रात इबादत से रौशन थी, हर दिन सब्र से सजा हुआ था, और हर सांस में अल्लाह की याद बसी हुई थी।

आज जब यह मुबारक महीना हमसे रुख़्सत होने को है, तो दिल से एक ही सदा निकलती है “या अल्लाह! अगर हमने इस रमज़ान में कुछ अच्छा किया, तो उसे कबूल फरमा और जो कमी रह गई, उसे अपनी रहमत से पूरा कर दे।” माह-ए-रमज़ान का आख़िरी अशरा…वो अशरा जो अपने अंदर बेशुमार रहमतें, मग़फ़िरतें और जहन्नम से निजात की खुशख़बरी समेटे हुए है।

यही वो वक्त है जब बंदा अपने रब के सबसे करीब होता है…जब एतिकाफ़ की सादगी में बैठकर इंसान दुनिया की हर हलचल से दूर होकर सिर्फ अपने खालिक से जुड़ जाता है। एतिकाफ़ सिर्फ मस्जिद में बैठ जाना नहीं,बल्कि अपने दिल को भी दुनिया की गंदगी से निकालकर पाक कर लेना है।

अपने गुनाहों पर शर्मिंदा होकर रोना है,और अपने रब से यूं बातें करना है जैसे एक बच्चा अपनी माँ से करता है… यही वो अशरा है जिसमें शब-ए-क़द्र जैसी अज़ीम रात छुपी हुई है वो रात जो हजार महीनों से बेहतर है वो रात जिसमें तक़दीरें लिखी जाती हैं…वो रात जिसमें झुका हुआ सिर और भीगी हुई आँखें कभी खाली नहीं लौटतीं आज जरूरत है कि हम इन आख़िरी लम्हों को यूं ही न गुजरने दें…बल्कि हर लम्हे को इबादत से सजाएं, हर सांस को दुआ बना दें और बार-बार अपने रब से ये फरियाद करें “या अल्लाह!

हमें जहन्नम की आग से आज़ादी अता फरमा, और अपनी रहमत में जगह दे दे। लेकिन रमज़ान की इस रुख़्सती के साथ एक नई सुबह भी आने वाली है…एक नई खुशी… एक नया पैग़ाम… ईद की खुशी…

ईद सिर्फ नए कपड़ों और मीठी सिवैयों का नाम नहीं,बल्कि ये उस जीत का जश्न है जो इंसान ने अपने नफ़्स पर हासिल की…ये उस सब्र का इनाम है जो पूरे महीने रखा गया ये उस इबादत का सिला है जो रातों की तन्हाइयों में अदा की गई ईद हमें सिखाती है कि अगर दिल साफ़ हो, तो छोटी सी खुशी भी जन्नत बन जाती है…अगर नीयत पाक हो, तो हर रिश्ता मोहब्बत में बदल जाता है।

आज जब हम ईद की तरफ बढ़ रहे हैं,तो हमें ये भी याद रखना चाहिए कि हमारे आस-पास कई ऐसे लोग हैं, जिनके पास खुशी मनाने के साधन नहीं तो क्यों न इस ईद, हम उनके चेहरे पर भी मुस्कान लाने की कोशिश करें किसी गरीब को कपड़े दे दें किसी भूखे को खाना खिला दें किसी उदास दिल को गले लगा लें यही असली ईद है यही रमज़ान का असली पैग़ाम है।

आज दिल ये भी कहता है ज़बाँ ख़ामोश दिल बेचैन बदन पे लरज़ा तारी है ठहर जा ऐ माह-ए-रमज़ाँ बड़ी ही बेक़रारी है जसारत अलविदा कहने की आख़िर मैं करूँ कैसे मेरी मग़मूम आँखों से नदी अश्कों की जारी है लेकिन फिर भी हर जुदाई के बाद एक मुलाक़ात होती है।

हर रात के बाद एक सुबह होती है इंशाअल्लाह अगर ज़िंदगी रही, तो अगला रमज़ान भी आएगा और हम फिर उसी जज़्बे, उसी मोहब्बत और उसी इबादत के साथ उसका इस्तक़बाल करेंगे अल्लाह हम सबकी इबादतें कबूल फरमाए हमें शब-ए-क़द्र की बरकतें नसीब करे…और ईद की खुशियों को हमारे लिए रहमत बना दे आमीन

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