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✍️ सैय्यद आसिफ़ इमाम काकवी
बिहार एक ऐसी सरज़मीन है जिसने दुनिया को इल्म दिया, तहज़ीब दी, सियासत को नई दिशा दी और इतिहास के सुनहरे बाब लिखे। नालंदा और विक्रमशिला की यह धरती कभी अपनी इल्मी रोशनी से पूरी दुनिया को मुनव्वर करती थी। लेकिन आज यही बिहार बार-बार ऐसे दर्दनाक वाक़ियात की वजह से सुर्ख़ियों में है, जो हर संवेदनशील इंसान के दिल को झकझोर देते हैं।
रोहतास ज़िले के डेहरी-डालमियानगर नगर परिषद के कार्यपालक पदाधिकारी विमल कुमार की बेरहमी से पीट-पीटकर हत्या ने एक बार फिर बिहार की क़ानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह घटना सिर्फ़ एक अफ़सर की हत्या नहीं, बल्कि उस भरोसे पर हमला है, जिसके सहारे आम नागरिक अपने राज्य में ख़ुद को महफ़ूज़ महसूस करता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि बिहार में क़रीब 21 वर्षों से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सत्ता में हैं। आज भी बिहार में जेडीयू-बीजेपी गठबंधन की सरकार है। केंद्र में भी बीजेपी की सरकार है और देश की राजधानी दिल्ली में भी वही सत्ता में है। जब राज्य और केंद्र में एक ही गठबंधन की सरकारें हैं, तो फिर बिहार में अपराधियों के हौसले इतने बुलंद क्यों हैं? आख़िर ऐसी कौन-सी कमी है, जिसकी वजह से अपराध थमने का नाम नहीं ले रहे? हर बार कोई बड़ी वारदात होती है।
पुलिस घटनास्थल पर पहुँचती है, वरिष्ठ अधिकारी मुआयना करते हैं, जांच बैठती है, विशेष टीम बनाई जाती है और दोषियों को जल्द गिरफ़्तार करने का दावा किया जाता है। इस मामले में भी मगध प्रक्षेत्र के आईजी विकास वैभव और औरंगाबाद के एसपी उपेंद्र नाथ वर्मा घटनास्थल पर पहुँचे। पुलिस ने मृतक के ड्राइवर मिथिलेश कुमार को हिरासत में लिया और जांच शुरू कर दी। यह कार्रवाई स्वागतयोग्य है, लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल घटना के बाद की कार्रवाई ही पर्याप्त है? क्या हमारी व्यवस्था अपराध होने से पहले उसे रोकने में भी उतनी ही सक्षम है? आज बिहार का आम नागरिक, व्यापारी, डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक, पत्रकार, वकील, सरकारी कर्मचारी और यहां तक कि प्रशासनिक अधिकारी भी अपने भीतर एक अजीब-सी बेचैनी महसूस कर रहा है। जब एक कार्यपालक पदाधिकारी सुरक्षित नहीं है, तो आम इंसान की सुरक्षा की गारंटी कौन देगा?
क़ानून का असली मतलब सिर्फ़ अपराधी को पकड़ना नहीं होता, बल्कि ऐसा माहौल बनाना होता है जिसमें अपराध करने से पहले ही अपराधी के दिल में क़ानून का ख़ौफ़ पैदा हो जाए। अगर अपराधी बेख़ौफ़ होकर सरकारी अधिकारियों पर हमला कर सकते हैं, तो यह केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं, बल्कि शासन-व्यवस्था की साख पर भी सवाल है।
बिहार ने पिछले दो दशकों में सड़क, पुल, शिक्षा, स्वास्थ्य और आधारभूत संरचना के क्षेत्र में निश्चित रूप से कई उपलब्धियाँ हासिल की हैं। इन उपलब्धियों से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन विकास का असली अर्थ तभी पूरा होता है, जब जनता अपने घर से निकलते समय यह भरोसा लेकर निकले कि वह सुरक्षित लौटेगी। अगर विकास के साथ सुरक्षा का एहसास न हो, तो विकास अधूरा रह जाता है।
आज ज़रूरत केवल अपराधियों की गिरफ़्तारी की नहीं, बल्कि अपराध की जड़ों तक पहुँचने की है। पुलिस तंत्र को आधुनिक तकनीक, बेहतर ख़ुफ़िया नेटवर्क, तेज़ अनुसंधान और जवाबदेही के साथ मज़बूत करना होगा। साथ ही न्यायिक प्रक्रिया को भी तेज़ बनाना होगा, ताकि अपराधियों को समय पर सज़ा मिले और समाज में एक स्पष्ट संदेश जाए कि क़ानून से ऊपर कोई नहीं।
सियासत का उद्देश्य केवल चुनाव जीतना नहीं, बल्कि जनता का भरोसा जीतना भी होता है। सरकार चाहे किसी भी दल की हो, उसकी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी नागरिकों की जान-माल की हिफ़ाज़त है। अपराध किसी दल या विचारधारा को नहीं देखता। उसकी मार हर परिवार पर बराबर पड़ती है। इसलिए अपराध पर राजनीति नहीं, बल्कि ठोस नीति और ईमानदार कार्रवाई की ज़रूरत है।
मीडिया का भी फ़र्ज़ है कि वह केवल सनसनी न फैलाए, बल्कि ऐसे मामलों को लगातार उठाए, सवाल पूछे और इंसाफ़ मिलने तक अपनी आवाज़ बुलंद रखे। लोकतंत्र में एक जागरूक मीडिया ही जनता और सत्ता के बीच जवाबदेही की सबसे मज़बूत कड़ी बनती है। रोहतास की यह घटना केवल एक समाचार नहीं है, बल्कि पूरे बिहार के लिए एक चेतावनी है। अगर आज भी व्यवस्था आत्ममंथन नहीं करेगी, तो कल ऐसे हादसे और बड़े रूप में सामने आ सकते हैं। जनता को भाषणों से ज़्यादा भरोसा कार्रवाई पर होता है। उसे आँकड़ों से ज़्यादा अपनी सुरक्षा का एहसास चाहिए।
आज बिहार की अवाम एक ही सवाल पूछ रही है क्या 21 वर्षों की हुकूमत के बाद भी हम ऐसा बिहार नहीं बना सके, जहाँ एक सरकारी अधिकारी भी सुरक्षित रह सके? क्या अपराधियों के दिल में क़ानून का ख़ौफ़ पैदा करना इतना मुश्किल हो गया है? और क्या हर दर्दनाक घटना के बाद सिर्फ़ जांच और आश्वासन ही हमारी नियति बनकर रह जाएँगे? उम्मीद की जानी चाहिए कि इस घटना की निष्पक्ष जांच होगी, दोषियों को जल्द से जल्द कड़ी सज़ा मिलेगी और सरकार इस हादसे को केवल एक आपराधिक घटना मानकर नहीं, बल्कि पूरे क़ानून-व्यवस्था तंत्र की समीक्षा के अवसर के रूप में देखेगी।
बिहार की जनता अम्न चाहती है, इंसाफ़ चाहती है और ऐसा माहौल चाहती है जहाँ किसी माँ को अपने बेटे, किसी पत्नी को अपने शौहर और किसी बच्चे को अपने पिता के घर लौटने की फ़िक्र न सताए। क्योंकि एक मज़बूत राज्य की पहचान केवल ऊँची इमारतों, चौड़ी सड़कों और बड़े-बड़े दावों से नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि वहाँ का सबसे आम नागरिक भी ख़ुद को कितना महफ़ूज़ महसूस करता है।
बिहार को अब वादों से नहीं, अमल से जवाब देना होगा। अवाम को तसल्ली नहीं, भरोसा चाहिए। बयान नहीं, इंसाफ़ चाहिए। और सबसे बढ़कर ऐसा बिहार चाहिए जहाँ क़ानून का इक़्तिदार अपराधियों के ख़ौफ़ से कहीं ज़्यादा बुलंद हो।

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