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जमाअत ए इस्लामी हिन्द की केंद्रीय सलाहकार परिषद अब न्याय और लोकतांत्रिक मूल्यों की सुरक्षा करेगी?

नफरती नैरेटिव राजनीतिक सत्ता हासिल करने का एक स्थायी ज़रिया बन गए हैं—खास तौर पर असम और पश्चिम बंगाल के चुनावों में—जो देश के लोकतांत्रिक भविष्य के लिए एक खतरनाक रुझान है।
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जमाअत की केंद्रीय सलाहकार परिषद ने मध्य-पूर्व और राष्ट्रीय स्थिति पर चिंता व्यक्त की, न्याय, संवाद और लोकतांत्रिक मूल्यों की सुरक्षा का आह्वान किया।

एआईएन/ संवादाता

नई दिल्ली, 29 अप्रैल 2026 – जमाअत-ए-इस्लामी हिंद की केंद्रीय सलाहकार परिषद (मरकज़ी मजलिस-ए-शूरा) ने दिल्ली स्थित अपने मुख्यालय में आयोजित तीन-दिवसीय सम्मेलन में दो महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किए। इसने वैश्विक स्थिति, विशेष रूप से मध्य पूर्व में हो रहे गंभीर घटनाक्रमों, तथा भारत की वर्तमान आंतरिक स्थिति के साथ-साथ विभिन्न राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों पर गहरी चिंता व्यक्त की।
पहला प्रस्ताव वैश्विक सूरतहाल से सम्बंधित है जिसमें कहा गया है, “अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान और लेबनान पर किए गए हमले अनुचित हैं और अंतर्राष्ट्रीय कानून का स्पष्ट उल्लंघन हैं। जिस तरह से नागरिक बुनियादी ढाँचे को निशाना बनाया गया और आम नागरिकों, स्कूलों, अस्पतालों तथा मासूम बच्चों पर बमबारी की गई वह दुनिया की अंतरात्मा के सामने गंभीर सवाल खड़े करते हैं। ये कार्रवाइयाँ मध्य पूर्व को भय और अस्थिरता की एक स्थायी स्थिति में बनाए रखने का एक व्यवस्थित और सुनियोजित हैं। साथ ही ये इज़राइली विस्तारवाद के एजेंडे को भी मज़बूत करती हैं। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को ऐसी आक्रामकता को रोकने के लिए एक सक्रिय, निष्पक्ष और ज़िम्मेदार भूमिका निभानी चाहिए तथा ठोस कदम उठाने चाहिए। अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में हुई शांति वार्ता से भले ही तत्काल कोई नतीजा न निकला हो, लेकिन उम्मीद है कि इससे गतिरोध टूटेगा और एक स्थायी समझौते का मार्ग प्रशस्त होगा; क्योंकि सभी संघर्षों और मुद्दों का समाधान केवल बातचीत के माध्यम से ही संभव है, और युद्ध इसका कोई समाधान नहीं हो सकता।”
देश की आंतरिक स्थिति को लेकर जमाअत-ए-इस्लामी हिंद की केंद्रीय सलाहकार परिषद के दूसरे प्रस्ताव में कहा गया है, “भारत की वर्तमान आंतरिक स्थिति तथा विभिन्न राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक चुनौतियाँ गहरी चिंता का विषय हैं। नफरती नैरेटिव राजनीतिक सत्ता हासिल करने का एक स्थायी ज़रिया बन गए हैं—खास तौर पर असम और पश्चिम बंगाल के चुनावों में—जो देश के लोकतांत्रिक भविष्य के लिए एक खतरनाक रुझान है। सत्ता की खातिर समाज को बांटना धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक ढांचे पर एक हमला है, और इसके राष्ट्र तथा उसके लोगों के लिए दीर्घकालिक रूप से हानिकारक परिणाम होते हैं। विशिष्ट राजनीतिक उद्देश्यों के लिए प्रमुख संवैधानिक और सरकारी संस्थाओं के बढ़ते उपयोग से जनता का विश्वास कम हो रहा है। ‘विशेष गहन संशोधन’ (SIR) प्रक्रिया के तहत मतदाता सूचियों के हालिया संशोधन में पाई गई अनियमितताएँ लाखों नागरिकों—विशेष रूप से मुसलमानों और अन्य हाशिए पर पड़े समूहों—को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बाहर करने के एक सुनियोजित प्रयास की ओर संकेत करती हैं; साथ ही, ऐसा प्रतीत होता है कि इसके पीछे एक गहरा राजनीतिक एजेंडा काम कर रहा है, जिसका उद्देश्य समाज के कुछ विशिष्ट वर्गों की राजनीतिक आवाज़ को कमज़ोर करना है।
जमाअत की केंद्रीय सलाहकार परिषद ने अपने निष्कर्ष में कहा है, “अभी भी ऐसे न्याय- प्रिय समूह, लोकतांत्रिक ताकतें, सामाजिक कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी और ज़िम्मेदार नागरिक मौजूद हैं जो स्थिति को बेहतर बनाने, संविधान की रक्षा करने और जनता के अधिकारों को बहाल करने के लिए प्रयासरत हैं। भारत सरकार को अपना दृष्टिकोण बदलना चाहिए और देश के सामने मौजूद वास्तविक मुद्दों—जिनमें ईंधन की कमी, बढ़ती महंगाई और बेरोज़गारी शामिल हैं—को हल करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जिनके लिए तत्काल और ठोस कार्रवाई की आवश्यकता है। यह अत्यंत आवश्यक है कि जनता अधिक जागरूक हो और सत्ता में बैठे लोगों को शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और रोज़गार जैसे वास्तविक मुद्दों पर जवाबदेह ठहराए। मुसलमानों से आग्रह किया गया है कि वे नकारात्मक प्रतिक्रियाओं और भावनात्मक राजनीति से दूर रहें, और इसके बजाय राष्ट्रीय व सामुदायिक विकास में योगदान देने, शिक्षा व क्षमता-निर्माण को बढ़ावा देने, साथी नागरिकों के साथ संबंधों को मज़बूत करने तथा संवाद का माहौल बनाने पर ध्यान केंद्रित करें; ताकि देश में न्याय, सामाजिक समानता, शांति और भाईचारा सुदृढ़ हो सके।”

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