
– डॉ. सत्यवान सौरभ
शहर इन दिनों कूड़े से अटे पड़े हैं। सड़कों के किनारे सड़ते ढेर, गलियों में फैली दुर्गंध, नालियों में फँसी गंदगी और उनके बीच भोजन तलाशते पशु—यह दृश्य केवल सफाई व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक सामाजिक सोच का आईना भी है। अक्सर जब शहर में सफाई कर्मचारियों की हड़ताल होती है, तब पूरा विमर्श केवल प्रशासन और कर्मचारियों के टकराव तक सीमित रह जाता है। लेकिन इस गंदगी के पीछे एक और बड़ा प्रश्न है, जिस पर समाज सुविधाजनक चुप्पी साध लेता है—पॉलिथीन और उससे जुड़ा कचरा प्रबंधन।
विडंबना देखिए कि पॉलिथीन कानूनन प्रतिबंधित है। नगर निगम समय-समय पर चालान भी काटता है, दुकानों पर छापेमारी होती है, जागरूकता अभियान चलते हैं। फिर भी शहर के हर कूड़े के ढेर में यदि सबसे अधिक कुछ दिखाई देता है, तो वह पॉलिथीन की थैलियाँ, पैकेजिंग और प्लास्टिक कचरा है। यह प्रश्न स्वाभाविक है कि जब प्रतिबंध है, तो उपयोग इतना व्यापक कैसे है? और यदि उपयोग जारी है, तो प्रतिबंध केवल कागज़ों तक सीमित क्यों है?
असल में हमारी व्यवस्था ने समस्या को जड़ से समझने के बजाय प्रतीकात्मक कार्रवाई को समाधान मान लिया है। निगम अधिकारी कभी-कभार दुकानदारों के चालान काटकर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेते हैं। कुछ दिनों तक अभियान चलता है, तस्वीरें खिंचती हैं, समाचार छपते हैं और फिर वही स्थिति लौट आती है। बाजार में दूध से लेकर दाल, नमकीन से लेकर सब्जी, ऑनलाइन डिलीवरी से लेकर घरेलू सामान तक लगभग हर वस्तु किसी न किसी प्रकार की प्लास्टिक या पॉलिथीन पैकिंग में उपलब्ध है। यानी जिस व्यवस्था ने पॉलिथीन को प्रतिबंधित किया है, वही व्यवस्था बाजार को उसके विकल्प देने में विफल रही है।
सच्चाई यह भी है कि पॉलिथीन केवल दुकानदार की समस्या नहीं है। यह हमारी उपभोक्तावादी आदतों का परिणाम है। सुविधा की संस्कृति ने हमें इस हद तक अभ्यस्त कर दिया है कि हम कपड़े या जूट का थैला साथ रखना अपनी “पुरानी आदत” समझने लगे हैं। हर छोटी वस्तु के लिए नई थैली लेना अब सामान्य व्यवहार बन चुका है। बाजार भी इसी मानसिकता पर फल-फूल रहा है। उपभोक्ता मांग करेगा तो आपूर्ति होगी ही। इसलिए केवल दुकानदार या निगम को दोष देकर समाज अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि यही पॉलिथीन अब पशुओं के लिए मौत का सामान बन चुकी है। शहर भले “पशु मुक्त” घोषित कर दिया गया हो, लेकिन हकीकत यह है कि हर गली, हर कूड़े के ढेर पर गाय, सांड, कुत्ते और अन्य पशु भोजन की तलाश में भटकते दिखाई देते हैं। वे सड़े भोजन के साथ पॉलिथीन भी निगल जाते हैं। पशु चिकित्सकों के अनुसार अनेक गायों के पेट से ऑपरेशन के दौरान कई-कई किलो पॉलिथीन निकल चुकी है। यह केवल पशुओं के प्रति क्रूरता नहीं, बल्कि हमारी संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है।
विडंबना यह है कि एक ओर समाज गाय को “माता” कहकर भावनात्मक सम्मान देता है, दूसरी ओर वही समाज उसे कूड़े के ढेर पर मरने के लिए छोड़ देता है। धार्मिक आस्था और वास्तविक व्यवहार के बीच इतना बड़ा अंतर शायद ही किसी अन्य विषय में दिखाई देता हो। त्योहारों और आयोजनों में पशुओं के नाम पर भावुकता दिखाई जाती है, लेकिन शहर की गलियों में उनका जीवन कूड़े और प्लास्टिक के सहारे चल रहा है। यह केवल प्रशासन की नहीं, समाज की नैतिक विफलता भी है।
पॉलिथीन का संकट केवल पशुओं तक सीमित नहीं है। यह पर्यावरण, स्वास्थ्य और शहरी जीवन तीनों के लिए गंभीर खतरा बन चुका है। नालियों में फँसी प्लास्टिक बरसात के समय जलभराव का कारण बनती है। सड़ते कचरे से जहरीली गैसें निकलती हैं। प्लास्टिक जलाने से वायु प्रदूषण बढ़ता है। धीरे-धीरे यही सूक्ष्म प्लास्टिक मिट्टी और पानी में मिलकर खाद्य श्रृंखला तक पहुँच रहा है। वैज्ञानिक लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि माइक्रोप्लास्टिक अब मानव शरीर में भी प्रवेश कर चुका है। यानी जिस पॉलिथीन को हम सुविधा मान रहे हैं, वही भविष्य में स्वास्थ्य संकट का कारण बन सकती है।
समस्या का दूसरा पक्ष कचरा प्रबंधन की विफलता है। हमारे शहरों में आज भी अधिकांश घरों से निकलने वाला कचरा बिना पृथक्करण के सीधे सड़कों या डंपिंग स्थलों तक पहुँचता है। गीला और सूखा कचरा अलग करने की बात वर्षों से कही जा रही है, लेकिन व्यवहार में यह व्यवस्था लगभग नदारद है। जब तक घर स्तर पर कचरे का पृथक्करण नहीं होगा, तब तक पुनर्चक्रण (रिसाइक्लिंग) की प्रक्रिया प्रभावी नहीं हो सकती। नगर निगम केवल कचरा उठाने को सफाई मान लेता है, जबकि वास्तविक सफाई का अर्थ है—कचरे का वैज्ञानिक निपटान।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि शहरों में “सिंगल यूज़ प्लास्टिक” पर प्रतिबंध की घोषणाएँ खूब होती हैं, लेकिन उद्योगों और बड़े ब्रांडों की जवाबदेही तय नहीं होती। बाजार में बिकने वाले अधिकांश उत्पाद प्लास्टिक पैकिंग में आते हैं। यदि वास्तव में पॉलिथीन बंद करनी है, तो केवल छोटे दुकानदारों पर कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी। बड़ी कंपनियों को भी वैकल्पिक पैकेजिंग अपनाने के लिए बाध्य करना होगा। जब तक उत्पादन स्तर पर बदलाव नहीं आएगा, तब तक उपभोक्ता और दुकानदार दोनों विकल्पहीन रहेंगे।
इसके साथ ही प्रशासन को भी अपनी प्राथमिकताएँ बदलनी होंगी। सफाई केवल फोटो अभियान नहीं हो सकती। शहर की सफाई व्यवस्था को स्थायी और तकनीकी रूप से मजबूत बनाना होगा। डोर-टू-डोर कलेक्शन, कचरे का पृथक्करण, रिसाइक्लिंग यूनिट, जैविक कचरे से खाद निर्माण और प्लास्टिक अपशिष्ट के सुरक्षित निपटान की ठोस व्यवस्था आवश्यक है। केवल जुर्माना लगाने से समस्या हल नहीं होगी। जब तक व्यवस्था व्यवहारिक विकल्प नहीं देगी, तब तक प्रतिबंध विफल ही रहेंगे।
शिक्षा और जनजागरूकता की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। स्कूलों, कॉलेजों और सामाजिक संस्थाओं को केवल औपचारिक अभियान चलाने के बजाय व्यवहार परिवर्तन पर काम करना होगा। बच्चों को यदि शुरुआत से कपड़े के थैले, पुनः उपयोग योग्य वस्तुओं और पर्यावरण संरक्षण की आदत सिखाई जाए, तो आने वाली पीढ़ी इस संकट को कम कर सकती है। समाज में यह समझ विकसित करनी होगी कि सफाई केवल सफाई कर्मचारी की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हर नागरिक का दायित्व है।
आज आवश्यकता केवल शहर को कूड़े से मुक्त करने की नहीं, बल्कि सोच को बदलने की है। यदि नागरिक सड़क पर कचरा फेंकते रहेंगे, बाजार प्लास्टिक बेचता रहेगा, प्रशासन दिखावटी कार्रवाई करता रहेगा और समाज पशुओं को कूड़े में भोजन खोजने के लिए छोड़ता रहेगा, तो कोई भी शहर वास्तव में स्वच्छ नहीं हो सकता।
हमें यह स्वीकार करना होगा कि कूड़ा केवल गंदगी नहीं, हमारी आदतों का परिणाम है। पॉलिथीन केवल एक थैली नहीं, सुविधा के नाम पर पैदा हुआ पर्यावरणीय संकट है। और कूड़े में मुंह मारते पशु केवल आवारा जानवर नहीं, बल्कि उस संवेदनहीन समाज के मौन प्रश्न हैं जो विकास के दावों के बीच अपनी बुनियादी जिम्मेदारियाँ भूल चुका है।
यदि अब भी हम नहीं चेते, तो आने वाले समय में शहर केवल कंक्रीट के जंगल नहीं होंगे, बल्कि प्लास्टिक और कचरे के ढेर बन जाएंगे, जहाँ इंसान और पशु दोनों ही स्वच्छ जीवन के अधिकार से वंचित होंगे। स्वच्छ शहर का सपना केवल सरकारी नारे से पूरा नहीं होगा। इसके लिए प्रशासनिक इच्छाशक्ति, सामाजिक जिम्मेदारी और व्यक्तिगत अनुशासन—तीनों का संगम आवश्यक है। तभी शहर सचमुच स्वच्छ होंगे, पशु सुरक्षित होंगे और पर्यावरण भविष्य के लिए बचाया जा सकेगा।
— डॉ. प्रियंका सौरभ
भारत के लगभग हर छोटे-बड़े शहर की एक भयावह तस्वीर अब आम होती जा रही है—कूड़े के ढेर में भोजन तलाशती गायें, प्लास्टिक निगलते बछड़े, सड़कों पर भटकते पशु और गंदगी से जूझती आबादी। एक तरफ समाज गाय को “माता” कहकर पूजता है, दूसरी तरफ वही गायें भूख, बीमारी और लापरवाही के कारण सड़कों पर दम तोड़ रही हैं। यह केवल सफाई व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक संवेदनहीनता और दोहरे चरित्र का जीवंत प्रमाण है।
आज देश के अधिकांश शहरों में सुबह का दृश्य लगभग एक जैसा होता है। दूध निकालने के बाद पशुपालक अपनी गायों को खुला छोड़ देते हैं। ये पशु फिर गलियों, बाजारों और कूड़े के ढेरों में भोजन तलाशते घूमते रहते हैं। सड़ी सब्जियाँ, प्लास्टिक की थैलियाँ, मेडिकल वेस्ट और जहरीला कचरा इनके पेट में जाता है। धीरे-धीरे यही जहर उनकी मौत का कारण बनता है। कई बार ऑपरेशन में गायों के पेट से कई किलो प्लास्टिक निकलता है, लेकिन समाज की संवेदनाएँ फिर भी नहीं जागतीं।
सबसे बड़ा सवाल उन पशुपालकों से है जो पशु को केवल “दूध देने वाली मशीन” समझते हैं। जब तक गाय से कमाई होती है, तब तक उसकी पूजा होती है, लेकिन जैसे ही वह सड़कों पर छोड़ दी जाती है, उसकी जिम्मेदारी खत्म मान ली जाती है। यह लालच और अमानवीयता का सबसे कुरूप चेहरा है। जिस पशु से घर चलता है, बच्चों की फीस भरती है और परिवार की आय बनती है, उसी को कचरे में मुंह मारने के लिए छोड़ देना किस संस्कृति और किस धर्म का हिस्सा है?
विडंबना यह है कि गाय के नाम पर देश में सबसे ज्यादा भावनाएँ भड़काई जाती हैं। राजनीति से लेकर धार्मिक मंचों तक “गौ माता” का जयकारा लगाया जाता है। सोशल मीडिया पर लोग गाय को रोटी खिलाते हुए वीडियो डालते हैं और खुद को बड़ा पशु प्रेमी साबित करते हैं। लेकिन यदि सच में गाय के प्रति प्रेम और सम्मान होता, तो शहरों की सड़कों पर कोई गाय भूखी, घायल या प्लास्टिक खाते दिखाई नहीं देती।
आज हालात इतने खराब हो चुके हैं कि शहरों में आवारा पशु केवल अपनी जान ही नहीं गंवा रहे, बल्कि आम लोगों की जान के लिए भी खतरा बनते जा रहे हैं। सड़क दुर्घटनाओं में हर साल हजारों लोग घायल होते हैं। रात के अंधेरे में अचानक सामने आए पशु कई बार जानलेवा हादसों का कारण बनते हैं। लेकिन न प्रशासन गंभीर दिखता है और न समाज।
नगर निगम और स्थानीय प्रशासन समय-समय पर अभियान चलाने की बातें करते हैं, लेकिन समस्या जड़ से कभी हल नहीं होती। कुछ पशु पकड़कर गौशालाओं में भेज दिए जाते हैं, कुछ दिनों तक कार्रवाई दिखाई जाती है और फिर सब पहले जैसा हो जाता है। असल समस्या यह है कि पशुपालकों की जवाबदेही तय ही नहीं की जाती। यदि कोई व्यक्ति अपने पशु को सड़क पर छोड़ता है, तो उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई क्यों नहीं होती?
यह संकट केवल पशुओं तक सीमित नहीं है। शहरों में फैला कचरा और गंदगी अब सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा बन चुकी है। खुले कूड़े के ढेर मच्छरों, मक्खियों और संक्रमण का घर बनते जा रहे हैं। बारिश में यही कचरा नालियाँ जाम करता है और जलभराव के साथ बीमारियों का संकट पैदा करता है। लेकिन हम सफाई को अब भी केवल सरकारी जिम्मेदारी मानकर अपने कर्तव्यों से बच निकलना चाहते हैं।
भारत “स्मार्ट सिटी” और आधुनिक विकास के बड़े-बड़े दावे करता है। चमकती सड़कें, बड़े मॉल और ऊँची इमारतें विकास का प्रतीक बन गई हैं। लेकिन असली विकास वह होता है जहाँ इंसान और पशु दोनों सम्मान और सुरक्षा के साथ जी सकें। जिस शहर में गायें कूड़े में भोजन तलाशती हों और लोग उस दृश्य को सामान्य मानकर गुजर जाएँ, वहाँ विकास केवल दिखावा है।
हमारी सबसे बड़ी समस्या यह है कि हमने संवेदनशीलता को प्रदर्शन में बदल दिया है। कैमरे के सामने दया दिखाना आसान है, लेकिन व्यवस्था बदलने की मांग करना कठिन। लोग मंदिरों में दान देते हैं, धार्मिक यात्राएँ करते हैं, गाय के नाम पर बहस करते हैं, लेकिन अपने आसपास फैली गंदगी और पशुओं की बदहाली पर चुप रहते हैं।
राजनीति भी इस मुद्दे पर केवल भावनात्मक लाभ उठाती रही है। चुनावों में गाय और धर्म के नाम पर भाषण दिए जाते हैं, लेकिन सड़कों पर मरती गायों के लिए ठोस नीति कहीं दिखाई नहीं देती। गौशालाओं के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च होने के दावे होते हैं, फिर भी शहरों में बेसहारा पशुओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। आखिर यह पैसा कहाँ जा रहा है? जवाबदेही कौन तय करेगा?
सबसे दुखद बात यह है कि बच्चों की पीढ़ी अब इस अमानवीय दृश्य की आदी होती जा रही है। रोज़ सड़क पर घायल पशु, कूड़े में भोजन तलाशती गायें और गंदगी का माहौल देखकर संवेदनाएँ धीरे-धीरे मरने लगती हैं। एक समाज जो अपने पशुओं तक के प्रति दयालु नहीं रह पाता, वह इंसानों के प्रति भी लंबे समय तक मानवीय नहीं रह सकता।
समाधान स्पष्ट है, बस इच्छाशक्ति की जरूरत है। सबसे पहले पशुपालकों की जिम्मेदारी तय करनी होगी। हर पशु का पंजीकरण अनिवार्य हो और पशु को सड़क पर छोड़ने पर भारी जुर्माना लगाया जाए। नगर निकायों को आधुनिक कचरा प्रबंधन प्रणाली लागू करनी चाहिए। प्लास्टिक के खुले उपयोग और कचरे के गलत निस्तारण पर सख्ती जरूरी है। गौशालाओं की वास्तविक स्थिति का पारदर्शी ऑडिट होना चाहिए।
साथ ही समाज को भी अपने व्यवहार में बदलाव लाना होगा। सड़क पर कचरा फेंकना, प्लास्टिक खुले में छोड़ना और हर समस्या के लिए केवल सरकार को दोष देना आसान रास्ता है। शहर नागरिक अनुशासन और सामूहिक जिम्मेदारी से बदलते हैं।
आज सड़कों पर फैला कचरा और उसमें भोजन तलाशती गायें केवल बदइंतजामी का दृश्य नहीं हैं। यह हमारे समाज के नैतिक पतन का आईना हैं। गायों के नाम पर शोर बहुत है, लेकिन उनकी वास्तविक पीड़ा पर खामोशी उससे भी बड़ी है। जब तक यह दोहरी मानसिकता खत्म नहीं होगी, तब तक न शहर सच में स्वच्छ होंगे, न पशु सुरक्षित होंगे और न ही हमारा समाज संवेदनशील कहलाने योग्य बचेगा।

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