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NCPUL का उर्दू सेमिनार किसके लिए? ज़मीन से तो उर्दू गायब हो चुकी है।

किस्से, कहानियों की तरह अब उर्दू की चर्चा सेमिनारों में ही किया जाता है, मदरसों, स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों तक उर्दू सीमित राह गई है। इसका ज़िम्मीवार कौन?
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पटना कॉलेज के उर्दू विभाग और राष्ट्रीय उर्दू परिषद के सहयोग से एक-दिवसीय सेमिनार

उर्दू और बिहार की क्षेत्रीय भाषाओं के बीच का रिश्ता बहुत गहरा और स्वाभाविक है: प्रोफ़ेसर एजाज़ अली अरशद

भाषाई और साहित्यिक आदान-प्रदान अलग-अलग भाषाओं से परिचित होने का एक महत्वपूर्ण ज़रिया है: प्रोफ़ेसर इम्तियाज़ अहमद

उर्दू और दूसरी भाषाओं के बीच के रिश्ते पर गंभीर चर्चा ज़रूरी है: डॉ. खालिद अनवर

एस. ज़ेड. मलिक
पटना – 2025 का फिनासियाल ईयर क्लोज़ होने वाला है, सरकार ने जिन जिन महकमे को पिछले साल जनहित में खर्च करने को दिया था, जिन महकमो ने उन बजट में जितना खर्च कर लिया वह तो ठीक है जो बच गया वह बचा हुआ बजट का पैसा 2026 वाले बजट के लागू होने से पहले सरकार वापस ले लेगी, यह विडंबना कहेंगे या महकमे का दुर्भाग्य?
भारत के लोक तंत्र की एक विडंबना यह भी की भारत सरकार फाइनेंसियल ईयर क्लोजिंग टाइम अप्रैल है, और अप्रैल से पहले, बजट सत्र बुलाती है और उसमें भारत के हर राज्यों में पिछले साल के खर्चे की तुलना करके आगामी वर्ष का बजट बनाती है, अब यह बजट बनाते बनाते और दूसरे राज्यों में भेजने की तैयारी करते हुए 6 से 8 महीने लग जाते हैं, और महकमे को अपने हिस्से के उस बजट को खर्च करने के लिए मात्र 3 से 4 महीने ही बचते हैं, अब उस बजट को खर्च करने के लिए महकमे के अधिकारियों को क्या अलग से मेहनत करनी पड़ती है, या वह उस बजट का पैसा ले कर बैठे रहते, या अपने दलालों के माध्यम से आपस मे बन्दर बांट करते हैं? एक कड़वा सच यह भी है जैसे ज़मीन से उर्दू लगभग गायब सी हो गई है, उर्दू सीमित जगहों पर देखने को मिलेगी, जैसे मदरसों और स्कूलों कालेजों विश्वविद्यालय में एक विभाग तक ही सीमित है, वह भी अब कहीं कहीं बन्द के कगार पर है, आकाशवाणी और दूरदर्शन में उर्दू को समाप्त हि कर दिया गया है। अब इससे पहले की सरकार बजट का बचा हुआ पैसा वापस ले ले महकमा के पदाधिकारीगण सेमिनारों और जागरूकता अभियान जैसे कार्यक्रमो को दिखा कर कुछ शातिर लोगों का जेब भरने का काम करते हैं, जैसे भारत सरकार फ़रोग़ उर्दू ज़बान के शातिर निर्देशक, चुन कर अपने खास लोगों को सेमिनार और जागरूकता योजना देते हैं। यह निर्देशक अपने गिने चुने जगहों पर जहां उनकी सेटिंग हो जाये वही वह हितकारी योजनाओं का लाभ पहुचाते है जैसे ——
पटना कॉलेज के ऐतिहासिक सेमिनार हॉल में ‘उर्दू का बिहार की क्षेत्रीय भाषाओं से रिश्ता’ विषय पर एक-दिवसीय सेमिनार आयोजित किया गया। यह सेमिनार राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद और पटना कॉलेज, पटना के उर्दू विभाग के सहयोग से हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में साहित्य विशेषज्ञ, शिक्षक, शोधार्थी और छात्रों ने हिस्सा लिया।
सेमिनार के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता जाने-माने लेखक और आलोचक प्रोफ़ेसर एजाज़ अली अरशद ने की। अपने अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने कहा कि उर्दू भाषा का विस्तार करने के लिए हमें अरबी और फ़ारसी के साथ-साथ दूसरी भाषाओं से भी शब्द लेने चाहिए। उन्होंने उर्दू को प्रेम, राजनीति और क्रांति की भाषा बताया और कहा कि उर्दू और बिहार की क्षेत्रीय भाषाओं के बीच का रिश्ता बहुत गहरा और स्वाभाविक है, और यह रिश्ता सदियों के भाषाई और सांस्कृतिक मेल-जोल का नतीजा है। उन्होंने आगे कहा कि अगर हम इन भाषाओं के बीच के रिश्ते को समझ लें, तो हम उर्दू के दायरे को और मज़बूत और व्यापक बना सकते हैं।
राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद के निदेशक डॉ. शम्स इक़बाल ने अपने परिचयात्मक भाषण में कहा कि उर्दू पर आम तौर पर अरबी और फ़ारसी के प्रभाव की बात की जाती है, लेकिन उर्दू पर क्षेत्रीय भाषाओं का प्रभाव भी उतना ही असाधारण है; इसलिए उर्दू का क्षेत्रीय भाषाओं से रिश्ता समझना आज की ज़रूरत है। उन्होंने आगे कहा कि भाषाई सौहार्द और आपसी सहयोग के बिना भाषाओं का विकास संभव नहीं है, और हमें बिना किसी भेदभाव के सभी भाषाओं को साथ लेकर चलना होगा।
नई शिक्षा नीति (NEP-2020) और भारतीय ज्ञान प्रणाली का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि मातृभाषाओं और क्षेत्रीय भाषाओं को बढ़ावा देना ही असल में शैक्षिक प्रगति की बुनियाद है।  मुख्य भाषण देते हुए, प्रख्यात इतिहासकार प्रोफेसर इम्तियाज़ अहमद (खुदा बख्श ओरिएंटल पब्लिक लाइब्रेरी के पूर्व निदेशक) ने कहा कि बिहार की मैथिली, मगही और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं ने उर्दू को समृद्ध किया है, और उर्दू ने भी उन्हें बहुत कुछ दिया है।
उन्होंने आगे कहा कि विभिन्न भाषाओं से अनुवाद की प्रक्रिया को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, ताकि हम एक-दूसरे के साहित्य और सभ्यता से परिचित हो सकें। उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि भाषाई और साहित्यिक आदान-प्रदान ज्ञान के दायरे को विस्तृत करता है।
मुख्य अतिथि डॉ. खालिद अनवर (विधान परिषद सदस्य, बिहार) ने कहा कि भाषाओं के आपसी मेलजोल पर गंभीर चर्चा ज़रूरी है। उन्होंने कहा कि भाषाओं को अलग-थलग रखकर विकास संभव नहीं है, बल्कि हर भाषा के साहित्य का खुले मन से स्वागत किया जाना चाहिए।
विशिष्ट अतिथि प्रो. अनिल कुमार (प्राचार्य, पटना कॉलेज) ने कहा कि उर्दू एक बहुत ही मीठी और मनमोहक भाषा है, जिसे सुनकर दिल खुश हो जाता है। उन्होंने आगे कहा कि इस भाषा की मिठास और सांस्कृतिक रंग इसे दूसरी भाषाओं से अलग बनाते हैं।
विशिष्ट अतिथि डॉ. अज़फ़र शम्सी (सदस्य, बिहार राज्य अल्पसंख्यक आयोग और प्राचार्य, DSM कॉलेज, झाझा) ने कहा कि उर्दू के प्रचार-प्रसार के लिए ज़मीनी स्तर पर गंभीर प्रयासों की ज़रूरत है। उन्होंने राष्ट्रीय परिषद की सेवाओं की सराहना की और कहा कि ऐसी संस्थाएँ उर्दू के भविष्य के लिए आशा की किरण हैं।
श्री प्रमोद कुमार सिंह (उप-संपादक, दैनिक जागरण) ने कहा कि भाषाओं के बीच मतभेद पैदा करने के बजाय, उन्हें एक-दूसरे के करीब लाने की ज़रूरत है। उन्होंने आगे कहा कि भाषाई सौहार्द ही एक मज़बूत और एकजुट समाज का आधार है।
उद्घाटन सत्र का संचालन डॉ. शादाब शमीम ने किया, जबकि स्वागत भाषण डॉ. नोमान कैसर ने दिया और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. बाल्मीकि राम ने किया।
सेमिनार का पहला तकनीकी सत्र ‘भोजपुरी और अंगिका का उर्दू से संबंध’ विषय पर आयोजित किया गया, जिसकी अध्यक्षता श्री मुश्ताक अहमद नूरी ने की। अपने अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने कहा कि बिहार की भाषाएँ अपनी समृद्धि और व्यापकता के कारण बहुत महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने मैथिली को एक समृद्ध और साहित्यिक रूप से मज़बूत भाषा बताया और कहा कि हालाँकि भोजपुरी बड़ी संख्या में बोली जाती है, फिर भी इसमें साहित्यिक कार्यों को और बढ़ावा देने की ज़रूरत है। उन्होंने बिहार की विभिन्न बोलियों का ज़िक्र किया और कहा कि इन सभी भाषाओं का उर्दू के साथ गहरा संबंध है।
विशिष्ट अतिथि डॉ. मुहम्मद अहसन (क्षेत्रीय निदेशक, मौलाना आज़ाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय, भोपाल) ने कहा कि किसी भी भाषा को जीवित रखने के लिए उसे शिक्षा से जोड़ना ज़रूरी है। उन्होंने आगे कहा कि उर्दू सेमिनारों में अन्य भाषाओं और विज्ञान विषयों को भी शामिल किया जाना चाहिए, ताकि एक व्यापक शैक्षणिक वातावरण तैयार हो सके।  इस सत्र में डॉ. नसीम अहमद नसीम, ​​डॉ. आफताब अहमद मुनिरी, डॉ. अब्दुल बासित हामिदी, डॉ. मिन्हाजुद्दीन, डॉ. शबनम परवीन और डॉ. शब्बीर आलम ने शोध पत्र प्रस्तुत किए। सत्र का संचालन डॉ. नोमान कैसर ने किया।
दूसरे तकनीकी सत्र का शीर्षक था ‘मैथिली और मगही का उर्दू से संबंध’, जिसकी अध्यक्षता प्रो. अबू बकर रिज़वी (रजिस्ट्रार, पटियाला विश्वविद्यालय) ने की। अपने अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने कहा कि मैथिली और मगही जैसी भाषाएँ उर्दू की भाषाई पूंजी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं और उनके आपसी संबंधों को समझना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने आगे कहा कि ये भाषाएँ सदियों से एक-दूसरे से गुंथी हुई हैं और उनकी साझा विरासत हमारी साझी सभ्यता को दर्शाती है।
विशिष्ट अतिथि, प्रोफेसर सूरज देव सिंह (विभागाध्यक्ष, उर्दू विभाग, पटना विश्वविद्यालय) ने कहा कि उर्दू और क्षेत्रीय भाषाओं के बीच संबंधों को बढ़ावा देना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उन्होंने आगे कहा कि भाषाई सौहार्द ही वैज्ञानिक प्रगति की नींव है।
श्री मुहम्मद अफ़ज़ल (शासी परिषद के सदस्य, NCPUL) ने कहा कि हमें भारत सरकार और शिक्षा मंत्री का आभारी होना चाहिए कि उन्होंने हमें यह अवसर प्रदान किया, जिसके चलते हम उर्दू और बिहार की क्षेत्रीय भाषाओं के बीच संबंधों पर चर्चा कर पा रहे हैं। मुझे आशा है कि ऐसे विषयों पर चर्चा करने से अन्य भाषाओं के लोग भी उर्दू से परिचित होंगे और निश्चित रूप से इससे उर्दू भाषा को भी बढ़ावा मिलेगा।
इस सत्र में डॉ. निसार फैज़ी, डॉ. अता आबिदी, डॉ. ज़रनगर यास्मीन, डॉ. अब्दुल हाई, डॉ. अशहद करीम उल्फ़त और डॉ. नरगिस फ़ातिमा ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए।
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यह संगोष्ठी सार्थक वैज्ञानिक और साहित्यिक चर्चाओं, संवादों तथा बौद्धिक आदान-प्रदान के साथ सफलतापूर्वक संपन्न हुई, जिसने उर्दू और बिहार की क्षेत्रीय भाषाओं के बीच आपसी संबंधों को एक नए दृष्टिकोण से समझने का अवसर प्रदान किया।  इस मौके पर डॉ. रेहान गनी, प्रोफेसर अब्दुल वाहिद अंसारी, प्रोफेसर सफदर इमाम कादरी, प्रोफेसर जावेद हयात, डॉ. अफजल हुसैन, डॉ. शहाबुद्दीन, डॉ. अफशां बानो, डॉ. सबोही इशरत, डॉ. असनी लता, डॉ. श्वेता कुमारी, डॉ. सिद्धार्थ, डॉ. अविनाश, डॉ. सुमन कुमारी, डॉ. नकी अहमद जान और डॉ. अनवारुल हुदा के अलावा बड़ी संख्या में दर्शक मौजूद थे।

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