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Disaster Management – बाढ़ प्रबंधन — बाढ़ नियंत्रण नहीं 

अतिथि नहीं है बाढ़ — वह हर साल आती है, लगभग तय समय पर

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ओंकार तिवारी✍️

इस अध्याय की पहली पंक्ति मैं अनुपम मिश्र जी के शब्दों से शुरू करना चाहता हूँ, जो उन्होंने अपनी अमर कृति “तैरने वाला समाज डूब रहा है” में लिखे थे। उनका कहना था — जो समाज कभी पानी में तैरना जानता था, नावें बनाना जानता था, बाढ़ के साथ जीना जानता था, वही समाज आज डूब रहा है — पानी से नहीं, अपनी भूली हुई समझ से। बाढ़ पहले भी आती थी, तब वह उत्सव थी; अब आती है तो आपदा है। पानी वही है, नदी वही है — बदले हम हैं।

अनुपम जी कहा करते थे — “बाढ़ अतिथि नहीं है। यह हर साल आती है, लगभग तय समय पर। अतिथि के लिए हम तैयारी नहीं करते, पर जो हर साल तय समय पर आए, उसके साथ तो रहना सीखना ही होगा।” और यह भी — “हमने अपनी जेब फाड़ रखी है। करोड़ों का संसाधन बरसता है, और हम उसे ‘निपटाने’ का तरीक़ा ढूँढ़ लेते हैं। निपटाना नहीं, साथ रहना सीखना होगा।”

यह अध्याय इसी एक शब्द-परिवर्तन की कथा है — नियंत्रण से प्रबंधन तक। नियंत्रण में अहंकार है — कि हम नदी से बड़े हैं। प्रबंधन में विनय है — कि नदी हमसे पुरानी है, हमें उसकी लय समझकर अपनी व्यवस्था बिठानी है।

पहले घाव का हिसाब — बाढ़ हमसे क्या ले जाती है

आँकड़े देखिए, क्योंकि नीति आँकड़ों की भाषा समझती है।

केंद्रीय जल आयोग के आँकड़ों पर आधारित विश्लेषण बताते हैं कि 1953 से 2021 के बीच बाढ़ ने भारत में लगभग 1.15 लाख जानें लीं — औसतन हर वर्ष 1,600 से अधिक। देश की 32.9 करोड़ हेक्टेयर भूमि में से 4 करोड़ हेक्टेयर से अधिक बाढ़-प्रवण है। 2011 से 2021 के दशक में बाढ़ और अतिवृष्टि से औसत वार्षिक आर्थिक क्षति ₹25,805 करोड़ आँकी गई — यानी हर दशक में ढाई लाख करोड़ से अधिक स्वाहा।

राज्यवार तस्वीर और भी बोलती है। 1953 से अब तक बाढ़-मृत्यु में उत्तर प्रदेश सबसे ऊपर है — लगभग 18,900 जानें; फिर आंध्र प्रदेश (क़रीब 17,000), बिहार (11,500), पश्चिम बंगाल (11,200) और गुजरात (10,000 से अधिक)। केंद्रीय जल आयोग के अनुसार बाढ़-क्षति का लगभग 33 प्रतिशत उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड में और 27 प्रतिशत अकेले बिहार में होता है। बिहार देश का सबसे बाढ़ प्रवण राज्य है — 2007 की कोसी-क्षेत्र की बाढ़ में ही लगभग 700 जानें गईं और ₹1,700 करोड़ की सार्वजनिक संपत्ति बही; मधुबनी, दरभंगा, मुज़फ़्फ़रपुर, पूर्वी चंपारण, सीतामढ़ी, समस्तीपुर — ये छह ज़िले अकेले राज्य की आधी बाढ़-क्षति झेलते हैं। असम में औसतन हर वर्ष ₹200 करोड़ की हानि दर्ज होती है और 2002 से अब तक कुल क्षति ₹16,000 करोड़ से ऊपर पहुँच चुकी है; ब्रह्मपुत्र का कटाव 1950 से अब तक राज्य की 4.27 लाख हेक्टेयर भूमि — यानी असम का सात प्रतिशत — निगल चुका है। पश्चिम बंगाल ने 2002 से अब तक ₹64,700 करोड़ से अधिक की क्षति झेली है। गुजरात और राजस्थान — जो सूखे के पर्याय माने जाते हैं — वहाँ भी अब हर दूसरे-तीसरे वर्ष शहरी बाढ़ और अचानक जल-प्लावन की ख़बरें आती हैं; वड़ोदरा, जामनगर, जोधपुर, जयपुर — मरुभूमि के शहर डूबते हैं और रेगिस्तान की नदी लूणी उफनती है। और इस क्षति के ऊपर राहत का बिल अलग। SDRF-NDRF के खाते से हर वर्ष हज़ारों करोड़ रुपये बाढ़-राहत, मुआवज़े और पुनर्निर्माण में जाते हैं — एक-एक मानसून में केंद्र और राज्यों द्वारा ₹6,000-7,000 करोड़ की तात्कालिक राहत जारी होना अब सामान्य बात है। यानी विडंबना दोहरी है — पहले हम बाढ़ रोकने पर तटबंधों-बाँधों में खर्च करते हैं, फिर बाढ़ के आने पर राहत में खर्च करते हैं, और बीच में वह जल — जो हमारी सदी का सबसे क़ीमती संसाधन है — समुद्र में बह जाता है। जेब सचमुच फटी हुई है।

अब वही सिक्के का दूसरा पहलू — यही उत्तर प्रदेश, बिहार, असम, बंगाल, गुजरात, राजस्थान गर्मी आते ही पेयजल के टैंकर, गिरते भूजल और बिगड़ती भूजल-गुणवत्ता से जूझते हैं। जो पानी हमें डुबोता है, वही पानी चार महीने बाद हमें तरसाता है। समस्या पानी नहीं है — समस्या समय और स्थान पर पानी का प्रबंधन है।

बलिया — मेरी अपनी मिट्टी की गवाही 

अब मैं आपको अपने घर ले चलता हूँ — बलिया, गंगा के उस मोड़ पर बसा ज़िला जहाँ से बिहार शुरू होता है। मेरा गाँव इंदौर — जो बोलचाल में बिगड़कर “अमदौर” हो गया, क्योंकि हमारे गाँव में आमों के इतने पेड़ थे कि पहचान ही आम से बन गई। मेरे बुज़ुर्ग रिश्तेदार आज भी उन आमों की क़िस्में स्थानीय बोली में गिनाते हैं तो आँखें चमक उठती हैं — चिनियावा आम, करियावा आम, सिंदूरिया आम — हर क़िस्म के साथ कोई रिश्ता, कोई क़िस्सा, कोई चौपाल जुड़ी है। वह सिर्फ़ फल नहीं था, वह उस मिट्टी की उर्वरता का उत्सव था।

बलिया के लोग गर्व से कहते थे — हम जल संपदा में देश के सबसे धनी हैं। हमारे पास गंगोत्री से चलकर आई गंगा है, अयोध्या होकर आई सरयू है, और कैलाश के जलागम का अमृत लेकर आई घाघरा है। तीन-तीन हिमालयी नदियों का संगम-क्षेत्र! हज़ार साल से — और मैं यह अवधि पूरे भरोसे से कह सकता हूँ — बलिया, बनारस, अयोध्या, मथुरा की बस्तियाँ इन्हीं नदियों के किनारे बसी हैं, इन्हीं का पानी पीती रही हैं। हज़ार साल में आर्सेनिक कभी समस्या नहीं बना।

और आज? आज बलिया का कम-से कम आधा हिस्सा भूजल में आर्सेनिक के गंभीर प्रदूषण से जूझ रहा है। यह पीड़ा मुझे आँकड़ों से नहीं, अपने मित्र सौरभ सिंह से मिली है, जो लगभग बीस वर्षों से बलिया में आर्सेनिक पर ज़मीनी काम कर रहे हैं। सौरभ ने यह विद्या उस महान वैज्ञानिक की छाया में सीखी जिन्होंने अस्सी-नब्बे के दशक में बांग्लादेश और बंगाल के आर्सेनिक संकट को दुनिया के सामने रखा — डॉ. दीपंकर चक्रवर्ती, स्कूल ऑफ एनवायरनमेंटल स्टडीज़, जादवपुर विश्वविद्यालय, कोलकाता। 1988 से गंगा-मेघना-ब्रह्मपुत्र के पूरे मैदान में डॉ. चक्रवर्ती की टीम ने लाखों नलकूपों के नमूने जाँचे, बलिया के गाँव-गाँव तक पहुँचकर आर्सेनिकोसिस के मरीज़ों को पहचाना, और बार-बार चेताया कि यह ज़हर धीरे-धीरे पूरे मध्य गंगा मैदान में फैल रहा है। बलिया के सुघर छपरा, तिवारी टोला जैसे गाँवों में हाथों-पैरों पर काले घाव लिए बैठे लोग, एक-एक परिवार में कई-कई मौतें — यह मेरी अपनी धरती की कहानी है।

हज़ार साल तक ठीक था, अब क्यों बिगड़ा? 

यही इस अध्याय का केंद्रीय प्रश्न है। आर्सेनिक कोई कारखाने से नहीं आया — वह इस भूगर्भ में सदा से था। अनुपम जी की वह पंक्ति याद आती है — “प्रकृति ने ज़हर नीचे छुपा रखा है।” प्रकृति ने ऊपर मीठा पानी दिया — नदी में, तालाब में, कुएँ की ऊपरी सतह में — और भारी धातुओं को गहरे तलछट में दबा रखा। जब तक समाज आस-पास बिखरे संसाधनों को देखता रहा और उन्हीं से काम चलाता रहा, ज़हर नीचे सोया रहा। हमने दो ग़लतियाँ कीं।

पहली ग़लती — पंप और मुफ़्त बिजली का अंधानुकरण। पंजाब-हरियाणा के हरित-क्रांति मॉडल की चकाचौंध में हमने मान लिया कि भूजल ही सर्वश्रेष्ठ जल है। ट्यूबवेल गहरे होते गए, बिजली मुफ़्त होती गई, और हम धरती की उन परतों तक जा पहुँचे जहाँ प्रकृति ने आर्सेनिक, आयरन और फ्लोराइड को क़ैद कर रखा था। जो विलासिता थी, उसे हमने आवश्यकता मान लिया।

 

दूसरी ग़लती — और यही इस अध्याय का मर्म है — हमने नदी को उसके फैलाव से काट दिया। गंगा-घाघरा जैसी मैदानी नदियाँ अपने स्वभाव से बलखाती (meandering) नदियाँ हैं। बाढ़ के दिनों में ये 20-30 किलोमीटर की चौड़ाई में फैलती थीं, और हर दो-तीन वर्ष में अपनी धारा एक-दो किलोमीटर खिसका लेती थीं। यह अराजकता नहीं, नदी की सफ़ाई-व्यवस्था थी। नदी के पानी में भारी धातुओं की जो थोड़ी-बहुत सांद्रता स्वाभाविक रूप से रहती है, वह इतने विशाल क्षेत्र में फैलकर नगण्य हो जाती थी — बूँद भर स्याही को समुद्र में घोल देने जैसा। तटबंधों और बाँधों ने नदी को एक सँकरी पट्टी में बाँध दिया। अब वही तलछट, वही धातुएँ साल-दर-साल एक ही सीमित पट्टी में जमा हो रही हैं — PPB से PPM की ओर बढ़ती सांद्रता में — और धीरे-धीरे उस सीमा को पार कर रही हैं जिसे मनुष्य का शरीर सह सकता है। जो नदी हर साल अपना आँगन बुहार लेती थी, हमने उसके हाथ बाँधकर कहा — अब सारा कूड़ा अपनी गोद में रखो। और फिर उसी गोद से हम नलकूप का पानी खींचकर पी रहे हैं।

तीसरी हानि गिनिए — भूजल पुनर्भरण। बाढ़ का फैला हुआ पानी हफ़्तों तक खेतों में ठहरकर धरती में उतरता था। मेरा अनुभव और बुज़ुर्गों की स्मृति कहती है कि बाढ़-क्षेत्रों में जलस्तर हर वर्ष 2-4 मीटर तक सहज ही ऊपर उठ जाता था। दुर्भाग्य से इस विषय पर — बाढ़ मैदानों के प्राकृतिक पुनर्भरण की मात्रा पर — हमारे देश में गंभीर और व्यवस्थित शोध लगभग नहीं हुआ है; तटबंध बनाने पर हज़ारों अध्ययन हैं, पर तटबंध ने कितना पुनर्भरण छीना, इसका कोई राष्ट्रीय लेखा-जोखा नहीं। यह अपने आप में हमारी प्राथमिकताओं की गवाही है। और चौथी — वह उर्वर गाद, जिस पर हम कभी इठलाते थे। बाढ़ हर वर्ष हिमालय की नई मिट्टी बिछा जाती थी और हम गर्व से कहते थे — हमारी मिट्टी में कुछ भी उगा लो, सब कुछ उगा लो। मैं तो यहाँ तक मानता हूँ कि नदियों के इसी वरदान ने — इसी निश्चिंत, उर्वर, सुरक्षित मैदान ने — हमें वह सांस्कृतिक ऐश्वर्य दिया जिस पर यह सभ्यता खड़ी है। काशी हज़ारों वर्षों से ज्ञान और मोक्ष की नगरी बनी रही। बुद्ध को बोध इसी गंगा के मैदान में मिला, गुरु नानक देव की ज्ञान-परंपरा पटना साहिब से जुड़ी। पाटलिपुत्र अपने युग में दक्षिण एशिया का सबसे समृद्ध और शक्तिशाली नगर था। मर्यादा पुरुषोत्तम राम हमें अयोध्या ने दिए — और ‘अयोध्या’ शब्द का अर्थ ही देखिए: जहाँ युद्ध न हो सके, जिसे जीता न जा सके। सोचिए, उस राज्य के निवासी अपने जल और अन्न को लेकर कितने निश्चिंत रहे होंगे कि नगर का नाम ही ‘अ-योध्या’ पड़ गया! आज के लोकप्रिय शिक्षक श्री अवध ओझा कहते हैं — आज का स्विट्ज़रलैंड ही अयोध्या है; बरसों से किसी युद्ध में भाग नहीं लिया, कोई शत्रु नहीं, और इसीलिए दुनिया भर की पूँजी वहीं जाकर विश्राम करती है। और कृष्ण — गोकुल-मथुरा की उर्वर, दूध-दही से छलकती धरती ने उन्हें वह निश्छल खिलंदड़पन दिया, वह रास, वह माखन-लीला। ध्यान से देखिए — यमुना का किनारा छूटा, गुजरात की ओर प्रवास हुआ, तो वही कृष्ण महान कूटनीतिज्ञ बने; धर्म की स्थापना की, गीता का ज्ञान दिया — पर गंगा-यमुना के मैदान वाली वह सहज क्रीड़ा, वह ठिठोली पीछे छूट गई। मिट्टी बदलती है तो मनुष्य का स्वभाव भी बदलता है — यह बात मैं किसी शास्त्रार्थ के लिए नहीं, इस विनम्र स्थापना के लिए कह रहा हूँ कि उर्वर और जल-सुरक्षित भूमि ही निश्चिंत समाज बनाती है, और निश्चिंत समाज ही संस्कृति रच पाता है। जिस दिन पानी की चिंता घर में घुसती है, उस दिन दर्शन खिड़की से निकल जाता है।

तो करना क्या है — नियंत्रित बाढ़, नियोजित वरदान 

अब मेरा विनम्र समाधान सुनिए — कहना आसान है, करना कठिन, यह मैं पहले ही स्वीकार करता हूँ। पर दिशा यही है।

आज हमारे पास नदियों पर बैराजों, बाँधों और फाटकों (flood gates) का पूरा जाल है — फरक्का से लेकर हर नहर-प्रणाली के हेड-रेगुलेटर तक। हमारे पास उपग्रह चित्र हैं, जिनसे एक-एक गाँव, एक-एक खेत की ऊँचाई-निचाई, मिट्टी और जल-निकासी का नक़्शा बन सकता है। यानी तकनीकी रूप से हम आज यह तय करने में सक्षम हैं कि किस क्षेत्र को, किस महीने, कितने दिन के लिए, कितने पानी से भरा जाए।

अभी होता क्या है? बाढ़ वहाँ घुसती है जहाँ हम नहीं चाहते — गाँव में, सड़क पर, अस्पताल में — क्योंकि हम उससे लड़ रहे होते हैं। तटबंध टूटता है तो पानी विस्फोट की तरह निकलता है और वही पानी विनाश बन जाता है। मेरा प्रस्ताव है कि हम लड़ाई छोड़कर मेज़बानी करें:

मानसून से पहले ही, उपग्रह चित्रों और समुदाय की सहमति से, हर नदी-खंड के लिए ‘बाढ़-स्वागत क्षेत्र’ चिह्नित हों — फ़सल-चक्र के अनुसार ख़ाली पड़े खेत, पुराने बाढ़-मैदान, गाँव के तालाब-पोखर-चौर। फाटकों के जाल से बाढ़ के पानी को नियंत्रित ढंग से इन्हीं क्षत्रों में फैलने दिया जाए।

इससे एक साथ चार काम होंगे। एक — फैला हुआ पानी हफ़्तों में धरती में उतरकर भूजल का वही पुरातन पुनर्भरण करेगा, जिससे गर्मी के टैंकर घटेंगे। दो — ताज़ा, स्वच्छ जल के विशाल पुनर्भरण से भूगर्भ में जमा हो रही आर्सेनिक, आयरन, फ्लोराइड की सांद्रता तनु (dilute) होगी — यह बलिया जैसे क्षेत्रों के लिए दवा का काम करेगा, क्योंकि आर्सेनिक की कोई दवा नहीं है, बचाव ही उपचार है। तीन — खेतों को हिमालय की वह उर्वर गाद फिर मिलेगी, जो किसी बोरी में नहीं बिकती। चार — जो पानी नियोजित क्षेत्रों में फैल गया, वह बस्तियों में नहीं घुसेगा; बाढ़ की चोटी (peak) ही कट जाएगी, और राहत-पुनर्वास के हज़ारों करोड़ बचेंगे। यही तो प्रबंधन है — उसी पानी को शत्रु की जगह अतिथि का कमरा दिखा देना।

पर शर्त वही, जो पिछले अध्याय में थी — नदी में सिर्फ़ नदी का पानी हो। अनुपम जी कहते थे, प्रकृति हर वर्ष अपनी नदियाँ स्वयं धो देती है; हमें बस उसमें अपना सीवेज, कचरा और औद्योगिक ज़हर उड़ेलना बंद करना है, तभी बाढ़ का प्रसाद ग्रहण करने लायक़ रहेगा। नियंत्रित बाढ़ तभी वरदान है जब फैलने वाला पानी जीवन लेकर आए, ज़हर नहीं।

पुरखे यह करके दिखा चुके हैं और यह कोई काग़ज़ी कल्पना नहीं है — हमारा समाज यह जी चुका है। असम, बिहार और बंगाल के पुराने समुदाय बाढ़ की प्रतीक्षा करते थे; उनके धान की क़िस्में पानी के साथ बढ़ने वाली थीं, और उतरते पानी के साथ न्यूनतम मेहनत में रोपाई-कटाई का पूरा तंत्र सधा हुआ था। घर ऊँचे चबूतरों पर, नाव हर आँगन में, और बाढ़ का महीना लगभग पंचांग में दर्ज। राजस्थान के जैसलमेर का उदाहरण तो चमत्कार है — जहाँ वर्ष भर का कोटा ही 70 मिलीमीटर बारिश का है, वहाँ सतह के ठीक नीचे जिप्सम की परत के कारण 20-30 मिलीमीटर बारिश में भी पानी फैलकर ‘बाढ़’ रच देता है। समाज ने इसे आपदा नहीं माना — खड़ीन रच डाली। ढाल पर मिट्टी की पाल बाँधकर उस चादर-पानी को खेत में रोका, नमी और नई मिट्टी में गेहूँ बोया — और रेगिस्तान में वह गेहूँ उगाया जिसके स्वाद की क़समें आज भी खाई जाती हैं। बिना नहर, बिना ट्यूबवेल, बिना बिजली — केवल बाढ़ को पढ़कर।

जो ज्ञान जैसलमेर की रेत में और कोसी के चौर में सैकड़ों साल परखा जा चुका है, उसे उपग्रह, सेंसर और फाटकों की आधुनिक तकनीक से जोड़ना — यही मेरी दृष्टि में इक्कीसवीं सदी का बाढ़-प्रबंधन है। हमें अमेरिका-यूरोप के उन मॉडलों की नक़ल से बचना होगा जो प्रकृति को जीतने पर खड़े हैं — और जिनकी अर्थव्यवस्थाएँ अंततः युद्ध के धन और तेल की छीना-झपटी पर टिकती रही हैं। वह रास्ता अहंकार का है, और अहंकार भीतर से खाता है। हमारा रास्ता वही है जो हमारे पुरखों ने दिखाया — प्रकृति के साथ रहकर समृद्ध होना। तभी जीवन उत्सव रहेगा, और तभी समाज वह होगा जो सचमुच स्व में स्थित है — यानी स्वस्थ।

तैरने वाला समाज फिर तैर सकता है। नदी ने तो कभी सिखाना बंद ही नहीं किया — बस विद्यार्थी कक्षा छोड़कर तटबंध पर चढ़ गया था। अब उतरने का समय है।

आइए, हम सब अपना-अपना हिस्सा निभाएँ

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