सम्बन्धित समाचार के लिये इसमे दिये गए लिंक पर क्लिक करें।http://www.mpnn.in ओंकार तिवारी✍️ इस अध्याय की पहली पंक्ति मैं अनुपम मिश्र जी के शब्दों से शुरू करना चाहता हूँ, जो उन्होंने अपनी अमर कृति “तैरने वाला समाज डूब रहा है” में लिखे थे। उनका कहना था — जो समाज कभी पानी में तैरना जानता था, नावें बनाना जानता था, बाढ़ के साथ जीना जानता था, वही समाज आज डूब रहा है — पानी से नहीं, अपनी भूली हुई समझ से। बाढ़ पहले भी आती थी, तब वह उत्सव थी; अब आती है तो आपदा है। पानी वही है, नदी वही है — बदले हम हैं। अनुपम जी कहा करते थे — “बाढ़ अतिथि नहीं है। यह हर साल आती है, लगभग तय समय पर। अतिथि के लिए हम तैयारी नहीं करते, पर जो हर साल तय समय पर आए, उसके साथ तो रहना सीखना ही होगा।” और यह भी — “हमने अपनी जेब फाड़ रखी है। करोड़ों का संसाधन बरसता है, और हम उसे ‘निपटाने’ का तरीक़ा ढूँढ़ लेते हैं। निपटाना नहीं, साथ रहना सीखना होगा।” यह अध्याय इसी एक शब्द-परिवर्तन की कथा है — नियंत्रण से प्रबंधन तक। नियंत्रण में अहंकार है — कि हम नदी से बड़े हैं। प्रबंधन में विनय है — कि नदी हमसे पुरानी है, हमें उसकी लय समझकर अपनी व्यवस्था […]
