क्या खेल है – चित भी मेरी – पट भी मेरी।। यही भाजपा 2013 में यूपीए की सरकार में जब मनमोहन सरकार के कार्यकाल में जब 33% महिला आरक्षण बिल को लाया गया तो इतना वबाल काटा था, कि यूपीए को वोटिंग करानी पड़ी और उसमें यूपीए को हारना पड़ा और उस बिल को ठंडे बस्ते में दबाना पड़ा था, लेकिन अब जब वर्तमान में भाजपा की सरकार है, और अभी 4 राज्यों में विधानसभा का चुनाव बाक़ी है, ऐसे में गड़े मुर्दे को उखाड़ने का क्या मक़सद है – स्प्ष्ट है हर हाल में चुनाव जीतना है, बिहार चुनाव जीता जागता प्रमाण है, केजरीवाल का फार्मूला जो दिल्ली लैब में तैयार किया गया, ” यानी आधी आबादी पर क़ब्ज़ा करना इसके लिये महिलाओं को फ्री योजना का लाभ , जैसे, दिल्ली में बस में यात्रा फ्री, दूसरा – राशन फ्री, बिजली फ्री, अस्पतालों में झोला भर भर के दवाइयां फ्री, 10वीं तक स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई फ्री, किताब ड्रेस के नाम पर अभिभावकों को साल में 3 बार 2500/₹ उनके अकॉउंट पेड़ कर देना, यह सभी योजनाओं को जनहित में केजरीवाल ने उन्हें अपने चुनावी वादों के अनुसार स्टार्ट किया तो उसे बन्द नहीं किया।
केजरीवाल ने इसके अलावा एक और महत्वपूर्ण योजना लागू किया – घर घर फ्री शराब, गली गली में शराब का ठेका। केजरीवाल सरकार को इससे दो लाभ मिला एक नोट और दूसरा वोट।।। इसी फार्मूले के आधार पर केजरीवाल ने पंजाब जीता। पंजाब में अपनी सरकार बनाली। वही फार्मूला अब भाजपा अपने राज्यों के चुनाव में अपना रही है, लेकिन भाजपा ने केजरीवाल के फार्मूला में और भी विस्तार करते हुुुए बिहार चुनाव में भाजपा ने चुनाव से एक हफ्ते पहले महिलाओं के खाते में 10,000₹ और गरीबो को दो दिनों का दारू की व्यावस्था करवा दी गरीब बिहारी मस्त हो गये, भाजपा के पैरों तले आ गए वैसे भारतीय गरीब बेचारे बड़े ही ईमानदार तो होते ही हैं, साथ मे एहसानमन्द भी होते हैं। गरीब गद्दारी नही करते, जिसकी खाते हैं उसकी सुनते हैं उसी की मानते और उसी की देते भी है। यह अलग बात की भाजपा के डीएनए में थोड़ा गद्दारी, बैमानी और हठधर्मी तो है, लेकिन पूंजिपतियों के लिए नहीं गरीबों के लिये।
बहरहाल – भाजपा ने एक बार फिर विपक्ष को मात दे दिया, भाजपा महिलाओं के आरक्षण के खिलाफ तो पहले ही से है, एप्ने सरकार में महिलाओं को अपने पक्ष में संगठित करने के लिए एक पैतरा चली, लेकिन उसे इस आरक्षण को रखने के लिए बहाना तो चाहिए था वह विपक्ष में मौका दे दिया। भाजपा संसद में 543 के अतिरिक्त तीन सौ कुछ सीटें और बढाना चाहती थी, जबकि विपक्ष का मानना है की सीटों बढाना घटाना परिसीमन और जनगणना के बाद होना चाहिये, लेकिन भाजपा इसे आरक्षण को अपने चुनावी हथकंडा बनाना चाहती है जो विपक्ष को मंजूर नहीं है।
ज्ञात हो कि – भारतीय संसद दो सदनों से मिलकर बनी है — लोकसभा और राज्यसभा।
यदि लोक सभा की 543 सीटों में 33% महिलाओं को दिया जाये तो 179. पुरुषों सदस्यों को लोकसभा से हटा कर महिलाओं को जोड़ना होगा और राज्यसभा में लगभग 81 सीट महिलाओं को देना होगा, यानी दोनो सदनों को मिला कर 260 सीटें महिलाओं को देनी होगी यानी वर्तमान में दोनो सदनों को मिला कर 788 सीटों में से 260 सीटें आरक्षित करनाल होगा
यदि पुरुषों सदस्यों को हटाए बिना महिलाओं को 543 की तुलना 33% दिया जाता है तो 179 लोकसभा और राज्यसभा की 81 सीटों को भारत के हर राज्यों में निकालना पड़ेगा। जो सम्भवतः मुश्किल काम है।
इसीलिए विपक्ष ने महिला आरक्षण को महिलाओं के लिए चुनावी लॉलीपॉप बताते हुए सरकार को आड़े हाँथ लेते हुये महिलाओं को आरक्षण देने से पहले जनगणना और परिसीमन करा कर ही महिलाओं को 33% आरक्षण देने की मांग की।
भाजपा के लिये महिला आरक्षण चुनावी मुद्दा है इसलिये की अभी 5 राज्यों में चुनाव की प्रक्रिया आरम्भ हो चुकी है, भाजपा इस आरक्षण बिल को अपने चुनाव में भुनाने की कोशिश करेगी, और विपक्ष को बदनाम करेगी कि महिलाओं का आरक्षण विपक्ष ने रुकवा दिया। यह प्रचार आरम्भ हो चुका है।

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